Unemployment Essay बेरोजगारी पर निबंध

Unemployment Essay बेरोजगारी पर निबंध. बेरोजगारी कलिकाल वर्णन के प्रसंग में गोस्वामी तुलसीदास ने अपने समय की बेरोजगारी का वर्णन करते हुए लिखा है 'खेती न किसान को भिखारी को न भीख बलि बनिक को बनिज न चाकर को चाकरी । जीविकाविहीन लोक सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सौं कहाँ जाई, का करी ?

Unemployment-Essay
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आज अपने देश की स्थिति इससे बहुत भिन्न नहीं है। बेरोजगारी सुरक्षा की भाँति नित्य मुख फैलाती चली जा रही है और समाधान के सारे उपाय 'तातल सैकत बारि विन्दु सम' बनते जा रहे हैं। आज प्रत्येक क्षेत्र के लोग किसी-न-किसी रूप में इस समस्या से परेशान हैं। कोई बेरोजगारी से पीड़ित है, तो कोई आतंकित। 

Unemployment Essay बेरोजगारी पर निबंध

सभी जिम्मेदार राजनीतिक दल और नेता इस समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार रहे हैं ताकि स्थिति को विस्फोटक बनने से पहले सम्भाला जाय। अपने देश में बेरोजगारी की समस्या दो प्रकार की है-

(1) अशिक्षित बेरोजगारों की समस्या और 
(2) शिक्षित बेरोजगारों की समस्या। 

शिक्षित बेरोजगार भी दो प्रकार के हैं - 

(1) तकनीकी शिक्षा प्राप्त बेरोजगार और
(2) गैर-तकनीकी शिक्षा प्राप्त बेरोजगार।

 इन सबकी समस्याएँ और परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं। समानता है तो केवल एक कि ये सभी बेरोजगार हैं। इनके हाथ को काम नहीं मिल रहा है, जिससे ये अपना और अपने परिवार का ठीक से भरण-पोषण कर सकें।
अशिक्षित बेरोजगार सबसे निरीह प्राणी है। 

किसी भी बड़े शहर के किसी चौराहे पर खड़े हो जाइए। आपको मैले-कुचैले, फटे, अधफटे कपड़े पहने लोगों की एक छोटी सी भीड़ मिलेगी। यह भीड़ शहर के आस-पास के गाँवों से आती है, दैनिक मजदूरी पर श्रम बेचने। कोई निश्चित नहीं है कि उसे प्रतिदिन काम मिल जाएगा। 

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यदि मिल भी जाय तो वह इतना कभी नहीं कमा पाता कि दु:ख या हर्ष के अवसर पर अथवा बीमारी में आवश्यकता भर खर्च कर सके। फिर जिस दिन बीमार पड़ा, रोजी समाप्त, रोटी समाप्त । देहात में काम के मौसम पर देहात में मजदूरी नहीं तो शहर का आसरा ! वर्तमान से लेकर भविष्य तक सारा अनिश्चित ! 

इसीलिए अशिक्षित बेकार बेहद निरीह प्राणी है। वह शारीरिक परिश्रम वाला कोई भी काम चाहता है। मगर अनिश्चित रोजगार उसके लिए बेकारी के बराबर होता है। दूसरा वर्ग शिक्षित बेरोजगारों का है। इस वर्ग की कठिनाई यह है कि यह पढ़-लिखकर श्रम का निरादर करना सीख जाता है। 

थोड़े सम्मान के अहम का शिकार हो जाता है और नौकरी के अतिरिक्त कोई भी दूसरा काम करना हेय समझता है। इस वर्ग की बेरोजगारी का अर्थ है-नौकरी का न मिलना। वह नौकरी चाहता है, चाय-पान सिनेमा और सूट चाहता है, अगर हो सके तो बंगला और कार भी। इस वर्ग की समस्या ही सर्वाधिक भयानक है।

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तकनीकी शिक्षा प्राप्त शिक्षित चाहता है कि शिक्षा समाप्त होती ही अच्छी नौकरी, अनिवार्यतः मिलनी चाहिए। ये तकनीकी शिक्षावाले लोग इतने बेकार हो जाते हैं कि किसी दूसरे काम के न तो लायक रहते हैं और न उनमें इतना आत्मबल रहता है कि वे कोई रिस्क लेकर दूसरा काम करें।

रहे गैर-तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवक, तो इनमें मुख्यतः कला, वाणिज्य, शिक्षा आदि विषयों

से बी० ए०, एम० ए० करने वाले लोग होते हैं। इनकी तो इस औद्योगिक युग में कोई पूछ ही नहीं है ये या तो अध्यापकी के चाहक होते हैं या तो किरानीगिरी के। बहुत हुआ तो कुछ प्रतिभाशाली प्रशासनिक सेवाओं में लगे। मगर जिस अनुपात में ये बी० ए०, एम० ए० पैदा हो रहे हैं उस 

अनुपात में नौकरियों के अवसर ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन के बराबर है। तब खाली हाथ, खाली मन क्या करें। बुराइयों, गलत कार्यों में संलग्न ही तो हों ! ये आवाज लगाते हैं-हमें रोजी की गारण्टी दो ! हमें भाषण नहीं रोजी दो। और नहीं तो बेरोजगारी भत्ता दो ! अर्थात् बिना कमाए भोजन! 

मगर दोष इनका नहीं है। दोष हमारी शिक्षा व्यवस्था का है। दोष हमारी सरकार की योजनाओं का है। किसी भी स्वतन्त्र देश में कोई भी सरकार सभी शिक्षितों को नौकरी नहीं दे सकती, यह एक ज्वलन्त सत्य है। अत: शिक्षा के साथ नौकरी को जोड़कर युवकों को पर मुखापेक्षी बनाए चलने की परम्परा गलत है। 

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सरकार को चाहिए कि नौकरियों में मिलने वाली सुविधाएँ इतनी कम करे कि लोग नौकरी प्रति अनावश्यक व्यामोह छोड़ें। उनका मनोविज्ञान बदले और बेरोजगारी का अर्थ 'नौकरी न' मिलना समझना बन्द करें। दूसरे, सरकार तकनीकी शिक्षा का प्रबन्ध इस अनुपात में करे कि केवल योग्य लोग तैयार हों 
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और आवश्यकता तथा उत्पादन में सदा अनुपात बना रहे। तकनीकी ज्ञानवाले लोगों को या तो नौकरी के अनुपात में पैदा किया जाय या पैदा किया ही नहीं जाए, ताकि वे अपनी शिक्षा को असहाय दशा का पर्याय समझकर कुंठित और विद्रोही न बनें।

Unemployment दूर करने के लिए तुगलकी योजनाएँ बन्द की जानी चाहिए और जाति, पैरवी, सम्पर्क आदि पर नौकरी के आवंटन की परम्परा को तोड़ने का प्रयत्न करना चाहिए। उद्योग धन्धों के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता के वितरण में व्याप्त भ्रष्टाचार को कठोरता पूर्वक कुचलना चाहिए। 

क्योंकि अनेक शिक्षित इसलिए भी सरकारी ऋण लेने से घबड़ाते हैं कि एक तो नब्बे खर्च करने पर नौ की लकड़ी मिलेगी और जूते घिसने में जो समय और श्रम का अपव्यय होगा वह अलग से।
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