Surdas ka sankshipt jivan-Vrit prastut karte hue. unki kavyagat vaishishtya par prakaash dalen. उत्तर-सूरदास भक्तिकालीन कृष्णभक्त कवियों में अग्रगण्य हैं जिन्हें हिन्दी काव्य-गगन का सूर्य बताकर हिन्दी काव्य-जगत की प्रचलित अग्रांकित काव्योक्ति में सम्मानित किया गया है - "सूर सूर तुलसी शशि उडुगन केशवदास, अन्य कवि खद्योत सम जहँ तहँ करत प्रकाश।"
अपने विनय, वात्सल्य एवं शृंगार विषयक पदों द्वारा महाकवि सूरदास ने नैराश्यान्धकार से बहुसंख्यक पीड़ित और हताश भारतीय जनता को उबार कर अपनी प्रखर काव्य-रश्मियों से न केवल अपने युग को रौशन किया अपितु परवर्ती काव्य-साहित्य भी किसी-न-किसी रूप में उनसे प्रभावित दृष्टिगत होता है।
महाकवि सूरदास का जन्म वार्ता-साहित्य के अनुसार दिल्ली के आस-पास सीही ग्राम में पुष्टि सम्प्रदाय के अनुसार वि० संवत् 1535 की सुदी 5 मंगलवार को हुई जिसकी पुष्टि अग्रांकित पंक्तियों से होती है "प्रगटे भक्त-शिरोमणि राय। _माधव शुक्ला पंचमि ऊपर छट्ट अधिक सुहाय।।"
Surdas ka sankshipt jivan-Vrit prastut karte hue. unki kavyagat vaishishtya par prakaash dalen
सूरदास, वार्ता-संहित अन्य बाह्मसाक्ष्य के आधार पर जन्मांध थे। उनके अन्धत्व का प्रमाण उनके स्वयं के पद से भी प्राप्त होता है "रास रस रीति नहिं बरनि आवै। इहैं निज मंत्र, यह ज्ञान यह ध्यान है, दरस दम्पति भजन सार गाऊँ। इन्हें माँगौ बार-बार प्रभु, सूर के नयन हौ रहो,
नर देह पाऊँ।।" सूरदास को वार्ता-साहित्य में जाति से सारस्वत ब्रह्मण माना गया है। किन्तु गोकुलनाथ कृत 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' में सूर की जाति की कहीं कोई चर्चा नहीं हुई है किन्तु सूर-निर्णय • के लेखकों का मानना है कि सूर, पुष्टि सम्प्रदाय में दीक्षित होने के पूर्व अपनी जाति का परित्याग कर चुके थे। _
Surdas ka sankshipt jivan-Vrit prastut karte hue
सच तो यह है कि नाम, ग्राम, जाति भौतिक जीवन जीनेवालों के लिए भले ही महत्वपूर्ण हों एक भक्त के लिए उन सर्वसामान्य भूमिकाओं का कोई महत्व नहीं होता है फिर सूरदास जैसे भक्त के लिए वे सब भला क्योंकर महत्वपूर्ण रहे जिन्हें पार कर वे अपने जीवन को एक अलग स्वरूप दे चुके थे। कभी वे मथुरा के विश्रामघाट पर तो कभी यमुना के किनारे गऊघाट पर जहाँ उन्हें भावी गुरु वल्लभाचार्य जी के दर्शन हुये थे
जिनसे दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे आजीवन श्रीनाथ जी के चरणकमलों के प्रति समर्पित रहे जिन्हें महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी ने एक नवनिर्मित मंदिर में वि० संवत् 1564 में स्थापित किया था जहाँ सूरदास के अतिरिक्त कुंभनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास आदि भी श्रीनाथ जी की सेवा तथा कीर्तन किया करते थे।
ये कीर्तनकार ही अष्टछाप के कवि कहलाये। पारसौली ग्राम में रहते हुए ही सूर का गोलोकवास वि० सं० 1640 के लगभग हुआ। ऐसा कहा जाता है कि सम्राट अकबर अपने दरबार के सुप्रसिद्ध गायक तानसेन के मुख से
सूरदास के एक पद का रसास्वादन कर उनसे मिले थे। जहाँ तक गोस्वामी तुलसीदास से सूर के मिलने के प्रश्न है तो इस सम्बन्ध में उपलब्ध कथन परस्पर विरोधी हैं। चित्रकूट में तुलसीदासजी से Surdas द्वारा मिलने और ब्रज में अपने भाई नन्ददास से मिलने आये तुलसीदासजी द्वारा पारसौली में सूर से मिलने की बात कही गई है जो भी हो दोनों के मिलने की चर्चा मूल ‘गुसाई चरित' में भी हुई है अतः दोनों के मिलने से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
Surdas ka sankshipt jivan-Vrit prastut karte hue
भक्त कवि सूरदास सगुणोपासक हैं। उनके आराध्य श्री कृष्ण हैं जिनके प्रति उन्होंने अपनी भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति दास्य, वात्सल्य, सख्य एवं माधुर्य भाव से की है। उन्हें महाप्रभु वल्लभाचार्य जी द्वारा प्रवर्तित पुष्टि सम्प्रदाय में दीक्षा प्राप्त हुई थी यही कारण है कि उन्होंने अपने आराध्य अथवा उपास्य श्रीकृष्ण की कृपा-प्राप्ति के लिए एक सच्चे भक्त के रूप में अपने अन्तस् में निरन्तर पाप-बोध एवं दुःख-बोध जाग्रत कर अपनी विनय-भक्ति के
अन्तर्गत दीनता, मानमर्षता, भय-दर्शन, आत्म-भर्त्सना, आश्वासन, मनोराज्य एवं विचारणा को लक्ष्य कर पद-रचना करते हुए अपनी जिस भक्ति-भावना को अभिव्यक्ति दी है उसमें उनका दैन्य और दास्यभाव ही प्रकट हुआ है। यहाँ तक तो वे स्वयं को अपने आराध्य से दूर पाते रहे और जैसे ही सख्य, वात्सल्य एवं माधुर्य भाव की साधना की ओर
उन्मुख होते हैं वैसे ही उन्हें अपने उपास्य का नैकट्य प्राप्त होता है बल्कि माधुर्य भाव की भक्ति उनकी भक्ति-पद्धति को उत्कर्ष देती है जहाँ पहुँचकर अपनी तन्मयता में उन्हें लौकिकता की जरा भी सुधि नहीं रहती है। उनकी भक्ति-पद्धति से सम्बन्धित कुछ उदाहरण यहाँ द्रष्टव्य हैं
"हमारे प्रभु, अवगुण चित्त न धरौ। समदरसी है नाम तिहारो, सोई तो पार करौ।।" (विनय)
"सोभित कर नवनीत लिये। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित, मुखदधि लेप किये। चारु कपोल-लोल लोचन, गोरोचन-तिलक दिये। लट-लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहि पिए। कठुला-कंठ, बज्र केहरि-नख, राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकोपल इहिँ सुख, का सतकल्प जिए।।" (वात्सल्य)
"गोकुलनाथ बिराजत डोल। संग लिये वृषभानु-नंदिनी, पहिरे नील निचोल। कंचन खचित लालमनि मोती, हीरा जटित अमोल। झुलवहिं जूथ मिलै ब्रजसुंदरि, हरषित करतिँ कलोल। खेलत, हँसति परस्पर गावति, बोलर्तिं मीठे बोल। सूरदास स्वामी पिय-प्यारी, झूलत हैं झकझोल।।" (वसंतोत्सव)
- Corruption........... Essay
महाकवि सूरदास की कई कृतियाँ उपलब्ध होती हैं, यथा सूरसागर, सूर-सारावली, साहित्य लहरी आदि। 'सूरसागर' सूरदास जी की न केवल प्रामाणिक एवं प्रसिद्ध कृति है अपितु महाकवि की लोकप्रियता का आधार-ग्रंथ भी है जिसका मूलस्रोत और उपजीव्य श्रीमद्भागवत मान्य है। इसकी कथा कुल 12 अध्यायों में वर्णित हुई है किन्तु दशम स्कंध इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण और प्राणस्वरूप अध्याय है जिसके पूर्वार्द्ध में कृष्ण-जन्म,
कृष्ण-लीला, पूतना-वध सहित भ्रमरगीत की कथा वर्णित है। भ्रमरगीत प्रसंग को महत्व न केवल वाग्वैदग्धता, हृदयस्पर्शिता, वचनवक्रता और उपालंभ को लेकर प्राप्त है अपितु यह शुद्ध पुष्टि का काव्य है जिसमें गोपियों द्वारा ज्ञानयोग को लक्ष्य कर व्यंग्योक्तियाँ करने के साथ ही योग और कर्म कांड का खंडन और भक्ति का संतुलन
