India's Nuclear Power Essay भारत की परमाणु शक्ति पर निबंध

India's Nuclear Power Essay भारत की परमाणु शक्ति। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन इन पाँच राष्ट्रों के एकाधिकार को समाप्त करते हुए 18 मई 1974 को प्रात: 8 बजे भारत ने जब अपना प्रथम परमाणु विस्फोट किया था तब देश का कण-कण हर्षोल्लास से नाच उठा था। श्रीमती गाँधी ने कहा था "भारत के वैज्ञानिकों ने अच्छा और व्यवस्थित काम कर दिखाया है। 

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हमें और सारे देश को इनपर गर्व है।" निर्भीक सिंहनी की भाँति गर्जना करते हुए और फटकार बताते हुए उन्होंने कहा था कि "शांतिपूर्ण बड़े देशों को विध्वंस के लिये अणु बम बनाने का अधिकार है और भारत जैसे विकासोन्मुख देश अपनी जनता की गरीबी तथा दूसरी मुश्किलों को हल करने के लिये भी अणु शक्ति का विकास नहीं कर सकते।" 18 अप्रैल 1975 को मध्याह्न 1 बजे भारत ने अपना पहला उपग्रह 'आर्यभट्ट' अन्तरिक्ष कक्ष में स्थापित किया। 

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अन्तरिक्ष में सफलता से कृत्रिम उपग्रह छोड़ने वाला भारत ग्यारहवाँ देश था। जब तक अमेरिका, रूस, पश्चिमी जर्मनी, फ्राँस, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और इटली इस विषय में सफलता प्राप्त कर चुके थे। 1979 में भारत ने भास्कर-प्रथम उपग्रह अन्तरिक्ष कक्ष में स्थापित किया। 

परन्तु भारतीय वैज्ञानिक भीतर ही भीतर इस बात पर घुटन महसूस कर रहे थे कि ये उपग्रह रूस की धरती से छोड़े गये थे। 18 जुलाई, 1980 को भारतीय वैज्ञानिकों ने मद्रास से सौ किलोमीटर दूर श्रीहरिकोटा में प्रात: आठ बजकर चार मिनट पर 'रोहिणी' उपग्रह छोड़ा। इसी प्रकार भास्कर-दो 20 नवम्बर 1981 को छोड़ा गया। इसी क्रम में भारत ने अनेक उपग्रह अन्तरिक्ष में भेजकर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान एवं गौरव प्राप्त किया।

प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की साहसी प्रेरणाओं ने इसी श्रृंखला में अपने कार्यकाल के स्वर्णिम इतिहास में कम दूरी पर काम करने वाले मिसाइल 'पृथ्वी' (25 फरवरी 1988) को तथा सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल 'त्रिशुल' के सफल परीक्षणों के बाद लम्बी दूरी के बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र ‘अग्नि' के अभूतपूर्व निर्माण और उसके छोड़ने में अद्वितीय सफलता प्राप्त की। 

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लम्बी दूरी का भारत का यह पहला प्रक्षेपास्त्र है। इसके साथ ही स्वदेशी स्तर पर प्रक्षेपास्त्र विकास में आत्म-निर्भरता एक नये अध्याय के प्रारम्भ के साथ ही भारत विश्व का छठवाँ देश हो गया जिनके पास मध्यम दूरी के बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र छोड़ने की क्षमता है। इससे पहले अमेरिका, सोवियत संघ, फ्रांस, चीन और इजराइल इस प्रक्षेपास्त्र का सफल प्रक्षेपण कर चुके हैं। अब भारत भी इन देशों में सम्मिलित हो गया है। यह प्रक्षेपण 22 मई, 1989 को प्रात: उड़ीसा के चाँदीपुर तट पर सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

बड़े हर्ष की बात है कि रक्षा विभाग द्वारा प्रारम्भ किये गये नियंत्रित प्रक्षेपास्त्रों के विकास के समन्वित कार्यक्रम का यह तीसरा परीक्षण सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया जिससे विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र भी आश्चर्यचकित रह गये। इससे पहले जमीन से हवा में मार करने वाली प्रक्षेपास्त्र 'त्रिशुल' तथा जमीन से जमीन पर मार करने वाले 'पृथ्वी' का

परीक्षण किया गया था ( भारत ने 'आकाश' और 'नाग' दो अन्य प्रक्षेपास्त्रों का भी विकास किया है लेकिन उनका प्रयोगशाला के बाहर परीक्षण नहीं किया गया है) लेकिन 'अग्नि' की सफलता के बाद तो भारत ने विशेष अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा अर्जित कर ली है क्योंकि 'बैलिस्टिक मिसाइल' तकनीक अभी तक दुनिया में केवल 7 देशों के पास है।

7 अगस्त 1991 को भारत ने श्री हरिकोटा में जमीन से हवा में मार करने वाली 'पृथ्वी 3' प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण किया। रक्षामंत्री श्री शरद पवार ने इस अवसर पर यहाँ घोषणा की कि 'पृथ्वी के सफल परीक्षण के साथ ही भारत उन गिने-चुने पाँच देशों में शामिल हो गया है जो

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इस तरह की क्षमता रखते हैं। इस श्रृंखला के प्रक्षेपास्त्रों की तीसरी कड़ी के रूप में जमीन से हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र का 10 बजकर 58 मिनट पर प्रक्षेपण किया गया। श्री पवार ने कहा कि 'भारत बहुत उम्दा किस्म के हथियार बनाने में सक्षम है और 'अन्तर्राष्ट्रीय शस्त्र बाजार' में प्रवेश पा सकता है।"

भारतीय प्रौद्योगिक संस्था के दीक्षान्त समारोह में रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला हैदराबाद के निदेशक डॉ० ए० जे० अब्दुल कलाम ने 9 अगस्त 1991 को कहा था कि प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम के तहत 'पृथ्वी', 'नाग', 'आकाश', 'अग्नि' और 'त्रिशुल' जैसे बहुद्देशीय प्रक्षेपास्त्र भारत ने बनाये हैं। देश में ही बने प्रक्षेपास्त्र 'पृथ्वी' और 'त्रिशुल' सेना को सौंप दिया गया।

18 मई 1974 को राजस्थान की भूमि पोखरन में एक विस्फोट किया गया था। उसे तापीय नाभिकीय परीक्षण बताया गया। तब से 24 वर्ष बाद मई 1998 में दो दिनों के अन्तराल पर उसी स्थान पर पाँच परीक्षण किये गए। इन परीक्षणों में विखण्डन पर आधारित परमाणु बम बनाने की क्षमता का प्रदर्शन किया गया। इन परीक्षणों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत के पास हाइड्रोजन बम बनाने की क्षमता है।
कुल मिलाकर इस कार्यक्रम को यदि सर्वागीण परिप्रेक्ष्य में देखें तो मानना पड़ेगा कि यह भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता का एक अद्वितीय उदाहरण है जिस पर हम सभी को गर्व होना चाहिए।
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