Your favorite author Essay आपका प्रिय लेखक निबंध. आपका प्रिय लेखक भारतीय वाङमय में अनेकानेक रचनाकार हुए हैं जो अपनी महान रचनाओं के कारण अमर हो गये हैं। किन्तु मुझे अपनी भाषा हिन्दी के महान रचनाकार प्रेमचन्द जितने पसन्द आए उतने अन्य नहीं। प्रेमचन्द कभी राजकीय सम्मानों से समलंकृत नहीं हुए; उन्हें जीवन में कभी सुखोपभोग नहीं प्राप्त हुए, निरन्तर आर्थिक अभाव के विष-दंश से छटपटाते रहे, फिर भी उन्होंने जो शाश्वत साधना का सरसिज खिलाया वह अपनी सुगंध से दिग्दिंगत को परिपूरित कर रहा है।
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कौन रचनाकार किसी के लिए सर्वाधिक प्रिय हो सकता है -- इसमें वैयक्तिक रुचि भी काम करती है। मेरे लिए वही रचनाकार सर्वाधिक प्रिय हो सकता है जो केवल कल्पना के पंखों पर सवार होकर अनन्त आकाश में उड़े नहीं वरन् जिसकी रचना में धूल-धूसरित धरती का यथार्थ हो। मेरी दृष्टि में सामाजिक स्थिति का चित्रण करने वाला रचनाकार ही सच्चा रचनाकार है। प्रेमचन्द ने कथा-साहित्य को प्रशस्त भूमि और उन्मुक्त हवा प्रदान की। जो कथा-संसार अस्पृश्य और
विवादास्पद था, प्रेमचन्द की लेखनी का स्पर्श पाकर गौरव मंडित हो गया। प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों एवं उपन्यासों में शोषितों दलितों, पीड़ितों की जीवन गाथा बड़े ही मार्मिक एवं सशक्त शब्दों में व्यक्त की है। जन-समाज में व्याप्त विषमता के अनगिनत चित्र उनकी रचनाओं में भरे पड़े हैं।
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प्रेमचन्द ने लगभग 36 वर्ष के अपने साहित्यिक जीवन में एक दर्जन उपन्यास और लगभग चार सौ कहानियाँ लिखीं। कुछ प्रमुख कहानियाँ इस प्रकार हैं-पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा, रानी सारंधा, बूढ़ी काकी, 'सवा सेर गेहूँ', सत्याग्रह, प्रायश्चित, कामना आदि। इसी तरह गोदान, रंगभूमि, गबन, कर्मभूमि आदि उनके प्रमुख उपन्यास हैं। प्रेमचन्द की रचना जीवन के स्पन्दन से परिपूर्ण है। ये रचनाएँ केवल मनोविनोद का उपकरण नहीं वरन् जीवन की वास्तविकता को बड़ी ही मार्मिक एवं सजीव अभिव्यक्ति हैं जिनमें गहराई तक डूबने की आवश्यकता है।
प्रेमचन्द, मानव मनोविज्ञान की बारीकी से अवगत हैं। सामन्ती समाज और उसके अत्याचार तथा नौकरशाही की पतनोन्मुख संस्कृति से उत्पन्न विकृतियों को उन्होंने अपनी कहानियों में अकृत्रिम रूप से अंकित किया है। 'सवा सेर गेहूँ', सत्याग्रह, प्रायश्चित, कामना आदि। 'सवा सेर गेहूँ का शंकर महाजनी सभ्यता की पाशविक वृत्ति से संत्रस्त है।
पूस की रात' कृषक मजदूर के अन्तहीन कष्टों के सिलसिले का करुण चित्र अंकित है। रौदी जाती अपनी फसल के प्रति उपेक्षा का भाव क्रूर व्यवस्था की सड़ांध से उत्पन्न है। 'कफन' कहानी के घीसू और माधो विकृत व्यवस्था के गर्भ से जनमे अभिशप्त और अभागे पात्र हैं। उनकी अकर्मण्यता, संवेदनशून्यता और निश्चिन्तता इस खूनखोर शासन-व्यवस्था से ही उद्भूत है।
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प्रेमचन्द ने बड़ी बारीकी से प्रशासनिक एवं सामाजिक संरचना का चित्र उपस्थित किया है। उनके उपन्यासों और कहानियों में स्वाधीनता संग्राम का सशक्त चित्रण भी मिलता है। इसी तरह गोदान, रंगभूमि, गबन, कर्मभूमि आदि उनके प्रमुख उपन्यास हैं। प्रेमचन्द की रचना जीवन के स्पन्दन से परिपूर्ण है। ये रचनाएँ केवल मनोविनोद का उपकरण नहीं वरन् जीवन की वास्तविकता की बड़ी ही मार्मिक एवं सजीव अभिव्यक्ति है जिनमें गहराई तक डूबने की आवश्यकता है।
प्रेमचन्द जनता के रचनाकार हैं, उनकी रचनाओं में जनता की आशा आकांक्षा, हास-विलास, सुख-दुख एवं शोषण उत्पीड़न का चित्रण है। आरंभ में वे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के हिमायती थे, किन्तु बाद में वे यथार्थवादी हो गये। जिन रचनाओं की चर्चा मैंने ऊपर की है उनमें वे पूरी तरह यथार्थवादी हैं। प्रेमचन्द की भाषा सहज, सरल और भावानुकूल है। बीसवीं सदी के आरम्भिक चार दशकों का अपने राष्ट्र की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक हलचलों का ग्राफ प्रेमचन्द की रचनाओं में उभर आया है।
_प्रेमचन्द ने कथा साहित्य के अनुपम उद्यान को अपने अन्तस् के रस से सींचा था। उनकी रचनाएँ जन-जीवन की गीता हैं; सत्यम शिवम सुन्दरम् की त्रिवेणी हैं। उनकी रचनाओं में मानवता का एक नया क्षितिज दृष्टिगत होता है। सचमुच कथा सम्राट् प्रेमचन्द अपनी अन्तर्दृष्टि, विलक्षण, प्रतिभा, गहरी संवेदना एवं अद्भुत चित्रण शक्ति के कारण महान हैं।