Corruption Essay भ्रष्टाचार पर निबंध. भ्रष्टाचार जब राजनीति अपने हित साधन के लिए भ्रष्ट तरीकों का सहारा लेती है तब उसे भ्रष्टाचार की राजनीति कहते हैं। यों राजनीति का भ्रष्टाचार से चोली-दामन सम्बन्ध होता है। राजनीति तो वस्तुतः वेश्या है जिसका कोई आचार नहीं होता। राजनीति चाहे राजतंत्र की हो या प्रजातंत्र की, भ्रष्टाचार उसके साथ छाया की तरह लगा रहता है।
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अपने देश में प्रजातंत्रिक शासन व्यवस्था है। इसके अन्तर्गत दलीय राजनीति होती है। दलों की कोई सीमा नहीं है। यहाँ तक कि कोई व्यक्ति बिना दल के भी चुनाव लड़ सकता है और राजनीति कर सकता है।
प्रजातांत्रिक व्यवस्था का आधार होता है-चुनाव। चुनाव के द्वारा जन प्रतिनिधि चुने जाते
Corruption Essay भ्रष्टाचार पर निबंध
हैं और शासन का प्रबन्ध करने या कानून का निर्माण करने वाली समिति के सदस्य बनते हैं। उन्हीं में से बहुमत प्राप्त दल या दलों के समूह द्वारा सरकार बनाकर शासन संचालित किया जाता है। यही प्रजातंत्रिक दलीय शासन प्रणाली है।
शासन का अर्थ होता है-सत्ता । इसके साथ पद और अधिकार जुड़ा होता है। अधिकार का सम्बन्ध सुविधा सुख और धन प्राप्ति है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि वह सत्ता का अंग बने। उत्साही लोग शासन में अपनी भूमिका निभाने हेतु चुनाव लड़ते हैं। हमारे देश का चुनाव चुनाव नहीं दंगल है।
इसमें उम्मीदवार जीतने के लिए अपना कल-बल-छल सब लगा देते हैं। बस यहीं से प्रारंभ होती है भ्रष्टाचार की राजनीति। लम्बे-चौड़े वायदे किये जाते हैं उम्मीदवारों द्वारा या पार्टियों द्वारा। पार्टियाँ बाजाप्ता अपना घोषणापत्र निकालती हैं। सत्ता में आने के बाद शायद ही वायदों को निभाती है। अतः झूठ के पुलिंदा घोषणा पत्र जनता के साथ धोखाधड़ी है और यह भ्रष्ट राजनीति का प्रथम सोपान है।
इसके बाद प्रारंभ होता है जीतने का चक्र । इसके लिए जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद का सहारा लिया जाता है, वोटरों को पैसे से खरीदा जाता है, बूथों पर से विपक्षी मतदाताओं को भगाकर बागस वोट डाले जाते हैं। यदि इतने से भी काम नहीं चलता है तो मतपत्रों के बक्सों में हेराफेरी की जाती है।, मतगणना में धाँधली की जाती है। ये सारे तरीके या उपाय जीत के लिए अपनाये गये भ्रष्ट तरीके हैं।
अतः ये भ्रष्टाचार की राजनीति के द्वितीय सोपान हैं। चुनाव के बाद यदि दुर्भाग्यवश किसी पार्टी को अपेक्षित बहुमत नहीं मिलता है तो पैसा तथा पद का लोभ देकर या सत्ता में हिस्सा देकर पार्टियों को आपस में मिलाकर साझा सरकार बनायी जाती है। यह भ्रष्टाचार की राजनीति का चौथा सोपान है।
Corruption Essay भ्रष्टाचार पर निबंध
सरकार बन जाने भर से समस्या का निदान नहीं होता है, पद और पैसे के लोलुप विधायक या सांसद मंत्री नहीं बनाये जाने पर कभी विद्रोह की धमकी देते हैं, कभी कुछ सदस्यों को मिलाकर दल बदल लेते हैं तो कभी अतिमहत्वाकांक्षी लोग विरोधियों से हाथ मिलाकर पूरी पार्टी ही बदल लेते हैं और रातोरात मंत्री या मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन जाते हैं।
चन्द्रशेखर जैसे लोगों का प्रधानमंत्री बनना या गुजरात में वाघेला का मुख्यमंत्री बनना ऐसे ही भ्रष्ट हथकंडे हैं जो किसी को रंक से राजा बना देते हैं। सत्ता के लोलुप राजनेता येन केन प्रकारेण हर हालत में अपनी सरकार बचाये रखने के लिए सर्वत्र गिद्ध दृष्टि घुमाते रहते हैं। यदि अपनी पार्टी से विरोध का भय होता है तो अपने छाया मित्रों (शेडो फ्रेण्डस) की सहायता से सरकार बचा लेते हैं।
इतना ही नहीं शाक-भाजी की भाँति या बैल-गाय की भाँति हमारे जन प्रतिनिधि बिकते हैं। हाँ हजारों में नहीं लाखों, करोड़ों में। भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा सरकार बचाने के लिए झारखंडी विधायकों को घूस देने का मामला अब तो अदालत का विषय बना हुआ है।
- Surdas ka sankshipt........... jivan-Vrit
ऐसे अवसरों पर जन प्रतिनिधि अपनी राजनीतिक विचारधारा, पार्टीगत प्रतिबद्धता आदि को कमीज की तरह उतार कर दूसरी पहन लेते हैं। कल तक जिसके साथ होते हैं आज उसके खिलाफ बोलते हैं तो कल तक जिसके खिलाफ थे आज उसी के गलहार बन जाते हैं।
यह भ्रष्टाचार का नंगा और बेह्या रूप है। केवल चुने गये प्रतिनिधि ही नहीं पार्टी के सदस्य और छोटे बड़े नेता भी रोज दल बदलते हैं। सारांशतः भ्रष्टाचार ने राजनीति को बेदी का लोटा बना दिया है। राजनीति प्रलोभन का शिकार हो कुछ भी कर सकती है, किसी हद तक पतित हो सकती है।
