Sur ke kavya kala dete hue unke vatsalya-varnan ki Visheshata bataiye || अथवा, सूरदास की भक्ति-भावना का परिचय दीजिए।

Sur ke kavya kala dete hue unke vatsalya-varnan ki Visheshata bataiye || अथवा, सूरदास की भक्ति-भावना का परिचय दीजिए। उत्तर-हिन्दी काव्य-गगन के मान्य सूर्य मध्यकालीन महान कवि सूरदास सगुणोपासक कृष्णासक्त कवि हैं। उन्होंने एक भक्तकवि के रूप में अपने आराध्य श्री कृष्ण के प्रति दास्य, संख्य एवं माधुर्य भाव से अपनी भक्ति-भावना को अभिव्यक्ति दी है। अपने आराध्य की सर्वशक्तिमता से वे भली-भाँति अवगत थे यही कारण है कि उनकी

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Sur ke kavya kala dete hue unke vatsalya-varnan ki Visheshata bataiye || अथवा, सूरदास की भक्ति-भावना का परिचय दीजिए।

आत्मसमर्पणपूर्ण श्रद्धा कृष्ण-भक्ति का आश्रय प्राप्त करती है। उन्हें श्री कृष्ण की असीम शक्ति के प्रति आकृष्ट होते देर नहीं लगती है क्योंकि

“जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे, अंधे को सबकुछ दरसाई ।।
बाहिरो सुमूक प्रानि बोलै, रंक चलै सिर छात्र धराई ।

सूरदास स्वामी करुणामय बार-बार बंदौ तिहि पाई। उपर्युक्त पंक्तियों में श्री कृष्ण की महिमा वर्णित हुई है। भक्तकवि सूरदास ने अपने पदों में श्री कृष्ण की सर्वशक्तिमता के प्रति आत्मसमर्पण करते हुए उनके चरित्र का जो मनोवैज्ञानिक विकास प्रदर्शित किया है वह अपनी स्वाभाविकता में अपूर्व है।

अष्टछाप कं कवियों में अग्रगण्य सूस्दास ने अपने आराध्य के सम्मुख अपने दुर्गुणों को स्वीकारते हुए उनकी कृपा की आकांक्षा प्रकट की है।

सूरदास की पद रचनाओं में मुख्यतया तीन सोपान दृष्टिगत होते हैं-दास्य, सख्य एवं माधुर्य। दास्य भाव से की गई कृष्ण-भक्ति के पद 'सूरसागर' के विनय के पदों में उपलब्ध होते हैं, सख्य के अन्तर्गत श्री कृष्ण की लीला के वर्णन से सम्बन्धित पद आते हैं और माधुर्य के अन्तर्गत उनके श्रृंगारिक पदों को सम्मिलित किया गया है 

जिनमें राधा-कृष्ण के मिलन के पश्चात रास प्रसंग आता है। तत्पश्चात संयोग, वियोग में तब्दील होता है और यह वियोग ही 'भ्रमरगीत' में प्रधान हो जाता है जहाँ गोपियों का ध्यान ज्ञानी उद्धव अपने ज्ञानोपदेश से निर्गुण ब्रह्म की आर आकृष्ट करने का प्रयास करते दिखायी देते हैं, जिन्हें अंत में गोपियों के तर्कों के आगे अपनी हार स्वीकारनी पड़ती है।

किन्तु लीला वर्णन के अन्तर्गत सूरदास ने जहाँ श्री कृष्ण के बाल रूप का वर्णन किया है वह प्रसंग भी कम महत्व नहीं रखता है जहाँ श्री कृष्ण साक्षात परब्रह्म के रूप में देखे जा सकते हैं क्योंकि वैसे स्थलों पर कवि द्वारा अलौकिकता के दर्शन कराये गये हैं। बालसुलभ चेष्टाओं के स्वाभाविक चित्रों की प्रस्तुति के साथ-साथ वहाँ श्री कृष्ण द्वारा पूतना-वध जैसी कई घटनाओं को घटित किये जाते दर्शाया गया है।

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कहना नहीं होगा कि सूर की भक्ति पुष्टिमार्गीय है जिसमें पुष्टिमार्गी भक्तकवि सूरदास द्वारा बल्लभाचार्य के पुष्टि मत में दीक्षा लेकर अपने काव्य में कृष्ण-भक्ति को पुष्ट करने के लिए

पुष्टिमार्गीय भक्ति के प्राय: सभी तत्वों का समावेश किया गया है। यही कारण है कि उनके पदों में दैन्य, मान-मर्षता, भर्त्सना, आश्वासन आदि का सम्यक् रूप से निर्वाह किया गया है। - कृष्ण-भक्त कवि सूरदास वात्सल्य के क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। श्री कृष्ण के बालरूप का वर्णन करने के क्रम में वात्सल्य रस का विस्तृत निरूपण कर उसे ऐसी व्यापकता दी गई है जहाँ वात्सल्य का कोई कोना उनसे शायद ही छूट पाया हो। 

सुधी समीक्षक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उनके वात्सल्य वर्णन के संदर्भ में ठीक ही कहा है कि,
“वात्सल्य के क्षेत्र का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बंद आँखों से किया है, उतना किसी और कवि ने नहीं, वे इसका कोना-कोना झाँक आए हैं।"

श्री कृष्ण के बाल रूप के वर्णन की प्रेरणा सूरदास को पुष्टि सम्प्रदाय से प्राप्त हुई थी जहाँ उनके गुरु वल्लभाचार्य ने उनका ध्यान उस ओर विशेष रूप से आकृष्ट किया था। तत्पश्चात उन्होंने अपने आराध्य श्री कृष्ण के प्रति वात्सल्य भाव से अपनी भक्ति-भावना को अभिव्यक्ति देनी आरंभ की। 

उन्होंने श्री कृष्ण के बाल रूप का वर्णन इतने स्वाभाविक ढंग से किया है जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उन्हें माता यशोदा का ह्रदय प्राप्त था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार “इनमें केवल बाहरी रूपों और चेष्टा का ही विस्तृत और सूक्ष्म वर्णन नहीं है, कवि ने बालकों की अन्तः प्रकृति में भी प्रवेश किया है और अनेक अन्य भावों की सुन्दर स्वाभाविक व्यंजना की है।"

भक्तकवि सूरदास ने श्री कृष्ण की बाल सुलभ चेष्टाओं के सूक्ष्म वर्णन के साथ ही उनके अन्तर्भावों की जैसी मार्मिक एवं विशद व्यंजना की है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है।

वात्सल्य वर्णन के अन्तर्गत बालक कृष्ण द्वारा घुटनों के बल चलते हुए अपनी ही परछाई को पकड़ने, मुख में दही लगाने, हाथ में मक्खन लिये रहने, माखन-चोरी के पकड़े जाने आदि से सम्बद्ध अनेक मनोहारी चित्र उपलब्ध होते हैं।

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कितना सुन्दर लगता है जब अपने आँगन में बालक कृष्ण कुछ-कुछ गाते हुए अपने छोटे-छोटे चरणों से नाचते हुए प्रसन्न होते हैं और अपने छोटे-छोटे हाथों से अपने मुँह में मक्खन डालते हैं फिर अपनी परछाई देखकर उसे अपने हाथ से मक्खन खिलाते हैं।

इसी प्रकार बालक कृष्ण के शैशव का वह चित्र दर्शनीय है जिसमें माता यशोदा बालक कृष्ण को सुलाने के लिए अनेकविध प्रयत्न करती है। जब बालक कृष्ण पलकं बंद कर होंठ फड़फड़ाने लगते हैं तब माता यशोदा उन्हें सोता हुआ जानकर मौन हो जाती है किन्तु थोड़ी ही देर बाद कृष्ण को व्याकुल होते देखकर पुनः गाने लगती है

"यशोदा हरि पालने झुलावे। हलरावै दुलराई मल्हावै, जोइ-सोइ कछू गावै। मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै। तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै। कबहुँ पलक हरि नूदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै। सोवत जानि मौन ह्वै रहि, करि करि सैन बतावै।

इहिं अन्तर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै।'' निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सूरदास ने श्री कृष्ण की बालसुलभ चेष्टाओं का अत्यन्त ही सूक्ष्म वर्णन प्रस्तुत किया है। वात्सल्य भाव की जैसी सुन्दर एवं स्वाभाविक व्यंजना यहाँ हुई है ऐसी अन्यत्र दुर्लभ है।

Suradas Ki Bhakti-bhavana ka Parichay Dijie. सूरदास की भक्ति-भावना का परिचय दीजिए।

सूरदास मूलतः एक कृष्ण-भक्त कवि हैं। उनकी कृष्ण-भक्ति की परिधि में ही कृष्ण और राधा का प्रथम दृष्टिजन्य प्रेम, संयोगावस्था से गुजरता हुआ विकास की चरमावस्था प्राप्त कर वियोग में तब्दील होता हुआ दृष्टिगत होता है और यही वियोग 'भ्रमरगीत' के अन्तर्गत जीवन-दर्शन के रूप में पूरी गहराई के साथ उद्घाटित हुआ है। वस्तुतः श्रद्धा के साथ प्रेम के मिलने का ही

नाम भक्ति है फिर भक्ति के तीन स्वरूपों में परिगणित की जानेवाली प्रेमाभक्ति ही माधुर्य के अन्तर्गत गृहीत हुई है जिसके सम्बन्ध में स्वयं सूरदास कहते हैं
"प्रेम भक्ति बिनु मुक्ति न होई नाथ! 
कृपा करि दीजै सोई।
और सकल हम देख्यौ जोइ, तुम्हारी कृपा होइ सो होई।" जहाँ भक्तकवि सूरदास ने श्री कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति माधुर्य भाव से की है वहाँ वे एक श्रृंगारी कवि के रूप में प्रस्तुत होते हैं और एक शृंगारी कवि के रूप में की गई उनकी पद-रचनाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि 

शृंगार के अन्तर्गत उनके द्वारा न केवल राधा-कृष्ण की शृंगारिक लीलाओं का विशद वर्णन भर प्रस्तुत किया गया है बल्कि यहाँ भी उनकी अप्रतिमता सिद्ध होती है।

शृंगार के नायक 'सूरसागर' में श्री कृष्ण हैं और नायिका राधा है जो पुष्टिमार्गीय दृष्टि से स्वकीया नायिका के रूप में ही कृष्ण से प्रेम करती है।

श्री कृष्ण और राधा का प्रेम प्रथम दृष्टिजन्य है। पीताम्बर धारण किये श्री कृष्ण जैसे ही ब्रज की गलियों से यमुनातट की ओर जाते हैं कि अचानक उन्हें राधा दिखायी देती है जो नीले वस्त्र धारण किये रहती है जिसके नेत्र विशाल हैं।
शृंगार के दो पक्ष होते हैं-संयोग और वियोग। 'सूरसागर' में श्रृंगार के दोनों ही पक्षों का उद्घाटन किया गया है। 

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श्रृंगार का संयोग पक्ष रासलीला के अन्तर्गत पूर्ण स्वाभाविकता के साथ उद्घाटित हुआ है। एक स्थल पर श्री कृष्ण राधा को समझाते हैं। राधा कृष्ण के पुरातन प्रेम से अवगत होकर काफी आनन्दित होती है। 

इतना ही नहीं वह स्वयं को अन्य गोपियों में विशिष्ट समझने लगती है। राधा का गर्व भला श्री कृष्ण को सहन कैसे हो सकता था और यही कारण है कि श्री कृष्ण के अन्तर्धान होते ही राधा-कृष्ण का संयोग अचानक वियोग में परिणत होता है। फिर तो यमुना भी काली दिखायी देने लगती है।
वियोग के अन्तर्गत श्री कृष्ण द्वारा भेजे गये ज्ञानी उद्धव द्वारा गोपियों को निर्गुण ब्रह्म का उपदेश दिया जाता है पर गोपियों के तर्कों के आगे उद्धव का ज्ञान गर्व चूर हो जाता है।

निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि लीला वर्णन के अन्तर्गत श्री कृष्ण और राधा की शृंगारिक लीलाओं का वर्णन अवश्य किया गया है किन्तु ऐसे स्थलों पर भी सूरदास द्वारा आध्यात्मिक संकेत दिये गये हैं जो प्रायः पाठक को ध्यान में नहीं रहते हैं। यही कारण है कि लोगों द्वारा उन पर उच्छृखल शृंगारिकता का दोषारोपण किया जाता है।

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