Bhartendu Harishchandra Ki Kavygat Visheshtaaon Pr Prakash Dalen. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालें अथवा, भारतेन्दु की कविताओं के भाग जगत पर प्रकाश डालिये। उन्हें आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक कहना क्या सही है ?
Bhartendu Harishchandra Ki Kavygat Visheshtaaon Pr Prakash Dalen || भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक और युगस्रष्टा कवि हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भाव-जगत में क्रांति उपस्थित करते हुए नवीन भावों को स्थान देकर उन्हें समृद्धि भी दी। सच कहा जाय तो भारतेन्दु एक व्यक्ति का नामभर नहीं होकर एक युग-विशेष के रूप में भी
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| Bhartendu Harishchandra Ki Kavygat Visheshta |
प्रासाद की ऊँचाई को स्पर्श करते दिखायी देते हैं। यह सबसे बड़ी बात कही जायेगी कि उन्होंने अपने साहित्य में जितना महत्व प्राचीनता को दिया उससे कहीं अधिक नवीनता को तभी उनके संदर्भ में आचार्य रामचंन्द्र शुक्ल कहते हैं, 'अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो वे पद्माकर और द्विजदेव की परंपरा में दिखाई पड़ते थे, दूसरी ओर बंग
देश के माइकेल और हेमचंद्र की श्रेणी में। एक ओर तो राधाकृष्ण की भक्ति में झूमते हुए कई भक्तमाल गूंथते हुए दिखायी देते थे। दूसरी ओर मन्दिरों के अधिकारियों और टीकाधारी बगुला भक्तों को हँसी उड़ाते और स्त्री-शिक्षा, समाज-सुधार आदि पर व्याख्यान देते पाये जाते थे। प्राचीन
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और नवीन का यही सुन्दर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है। प्राचीन-नवीन के उस सन्धिकाल में जैसी शीतल कला का संचार अपेक्षित था, वैसी ही शीतल कला के साथ भारतेन्दु का उदय हुआ, इसमें सन्देह नहीं।"
भारतेन्दु बाबू का जन्म वाराणसी के एक सम्भ्रान्त वैश्य कूल में सन् 1850 ई० में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबू गोपालचन्द्र था जो ब्रजभाषा के अच्छे और लोकप्रिय कवि थे जिनकी कविताएँ प्रायः 'गिरिधरदास' उपनाम से छपा करती थीं। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही आगत अध्यापकों से प्राप्त की।
इस दौरान उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी आदि कई भाषाएँ सीखीं। उनका विवाह तेरह वर्ष की अवस्था में लाला गुलाबराय की कन्या मन्नोदेवी के साथ हुआ तदुपरांत वे सपरिवार जगन्नाथपुरी की यात्रा पर गये जहाँ उन्हें बंगाल के कतिपय उन नये कलाकारों से मिलने का सुयोग प्राप्त हुआ जिनसे
वहाँ के जन-जीवन के बारे में बहुत कुछ जानने-समझने का अवसर प्राप्त हुआ। अपनी यात्रा पूरी कर जब वे लौटे तबसे अनवरत साहित्य की सेवा करते रहे और इस प्रकार लगभग पैंतीस वर्ष की अल्पायु में वे सन् 1885 ई. में इस संसार को छोड़कर सदा के लिए चले गये।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अपने समय के सर्वाधिक सजग और बहुआयामी कवि हैं। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व उनके द्वारा सृष्ट साहित्य, में प्रतिबिम्वित होता हुआ देखा जा सकता है। यद्यपि उन्हें विधिवत शिक्षा प्राप्त नहीं हुई तथापि अपने रचना-कौशल के कारण जो प्रसिद्धि उन्हें प्राप्त हुई वैसी विरले ही को प्राप्त होती है।
Bhartendu Harishchandra Ki Kavygat Visheshtaaon Pr Prakash Dalen
उन्होंने अपनी अल्पायु में ही साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी चलाकर युगीन कवियों और लेखकों का ध्यान नवयुग की ओर आकृष्ट किया। भारतेन्दु अपनी काव्य-यात्रा ब्रजभाषा से आरंभ करते हैं तत्पश्चात खड़ी बोली हिन्दी के उद्धरार्थ अनेक प्रयत्न करते हैं। इस दृष्टि से उनकी अग्रांकित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं
'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत ना हिय को शूल।'
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निज भाषा के उद्धार का कार्य पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी किया, उनके पत्र-पत्रिकाओं में कवि वचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैगजीन, हरिश्चन्द्र चन्द्रिका आदि प्रमुख हैं।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी कविता के क्षेत्र में सर्वप्रथम एक कृष्णभक्त कवि के रूप में दिखायी देते हैं। कृष्ण-भक्ति से सम्बन्धित उनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में रचित हैं जो वैष्णव भावना से ओत-प्रोत दृष्टिगत होती है। इस दृष्टि से उनकी
अंग्राकित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं
म 'हम तो मोल लिए या घर के।
दास-दास श्री वल्लभ कुल के चाकर राधावरके।'
अपनी रचनाओं में कृष्णभक्त कवि भारतेन्दु ने पुष्टि सम्प्रदाय में दीक्षित होने के कारण अपने आराध्य श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके प्रति अपनी भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति दास्य भाव से करते हैं। कतिपय ऐसे भी स्थल उनकी रचनाओं में दिखायी देते हैं। जहाँ उन्होंने अपने
आराध्य श्रीकृष्ण को प्रियतम के रूप में दर्शाया है। उनकी भक्तिपरक रचनाओं में सूर के पदों वाली तन्मयता और मीरा के पदों वाली आत्मविखलता स्पष्टतया दृष्टिगोचर होती है।
इतना ही नहीं भारतेन्दु ने अपनी शृंगारपरक रचनाओं में गोपियों के प्रेम-वर्णन में जिस रसिकता का परिचय दिया है, वह तो देखते ही बनता है। इस प्रकार की रचनाओं में प्रमुखतया नायिका-भेद, नख शिख वर्णन और शृंगार रस की जैसी पुष्टि हुई है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है।
विरहिणी गोपियों की अन्तर्दशा का अत्यंत ही मर्मस्पर्शी चित्रण उन्होंने अपने काव्य में जिस खूबी के साथ किया है वह उनकी नवीनता है। उनकी शृंगारपरक रचनाएँ रीतिकालीन कवियों की स्पष्ट छाप लिये दृष्टिगत होती है।