प्रश्न-4. रसखान के काव्यगत वैशिष्टयों पर प्रकाश डालें। अथवा, रसखान के पठित पदों के आधार पर उनके कृष्ण-भक्ति का उद्घाटन करें।
उत्तर-रसखान हिन्दी कविता के क्षेत्र में सगुण कृष्णभक्त कवियों में पांक्तेय हैं। उनके संदर्भ में आश्चर्यजनक बात यह है कि रहीम की तरह मुसलमान होने का पता उनके पदों को पढ़ने से नहीं लगाया जा सकता है। पर सच है कि गोसाई विट्ठलनाथ का शिष्यत्व ग्रहण करन केवल वैष्णव कहलाये अपितु अपने पदों में सगुणोपासना पर काफी बल भी दिया।
Raskhan ki kavyagat vaishishtya par prakash dalen रसखान के काव्यगत वैशिष्टयों पर प्रकाश डालें
रसखान का जन्म दिल्ली में संवत् 1615 विक्रम के लगभग होना मान्य है और उनका देहावसान संवत् 1685 विक्रम के आसपास होना माना गया है। उन्होंने दिल्ली में जन्म लेकर भी अपना निवास-स्थल ब्रजभूमि को बनाया जहाँ वे कृष्ण की छवि पर मुग्ध होते हुए सृजनोन्मुख हुये।
एक अनुश्रूति के मुताबिक उनका एक अत्यंत अभिमानी और रूपगर्विता नारी से प्रेम था जिससे अनादर पाकर ही वे कृष्ण-भक्ति की ओर उन्मुख हुए और वृन्दावन चले आये जहाँ रहते हुए उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की।
Raskhan ki kavyagat vaishishtya par prakash dalen रसखान के काव्यगत वैशिष्टयों पर प्रकाश डालें
रसखान की कृतियों में प्रेमवाटिका और सुजान रसखान प्रमुख हैं जिनमें क्रमश: विशुद्ध प्रेम विषयक तथा भक्ति और प्रेम विषयक दोहे एवं अन्य छंदों में रचित रचनाएँ संग्रहित हैं।
रसखान एक सच्चे कृष्णभक्त कवि थे। अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति प्रेम-लक्षणा हुई। सच तो यह है कि वे पहले सहृदय भावुक व्यक्ति हैं फिर भक्त और भक्त कवि जहाँ वे एक कृष्ण-भक्त कवि के रूप में दिखायी देते हैं। वहाँ उनकी भक्ति में रसिकता और प्रेम का सन्तुलन बना हुआ दृष्टिगत होता है।
रसखान के पठित पदों के आधार पर उनके कृष्ण-भक्ति का उद्घाटन करें।
ध्यातव्य है कि उन्होंने श्री कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति सख्य भाव से की है जहाँ एक सखा की प्रगल्भता और आत्मीयता के दर्शन सहजता से होते हैं। उनकी भक्ति में यदि एक ओर कृष्ण के प्रति एक सखा की अन्तरंगता दृष्टिगोचर होती है
वहीं दूसरी ओर उनकी भक्ति में अपने आराध्य का समीप-लाभ प्राप्त करने के लिए तन्मयता की विद्यमानता भी देखी जा सकती है जो अन्यत्र दुर्लभ है तभी तो उनके संदर्भ में कभी भारतेन्दु ने कहा था कि, इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटिक हिन्दू बारिय।' रसखान की भक्ति में माधुर्य भाव की विद्यमानता के कारण
प्रेम के शुद्ध स्वरूप को ही वर्णित किया है।
वह प्रेममूलक लगती है किन्तु उनका प्रेम लौकिक नहीं अपितु उसी प्रकार अनिर्वचनीय है जैसे कि भगवान। उन्होंने जहाँ कहीं भी अपने जीवन की गहरी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति की है वहाँ शास्त्रीयज्ञान की अनुपलब्धता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। सच कहा जाय तो उन्होंने अपने पदों में भारतीय प्रेम के शुद्ध स्वरूप को ही वर्णित किया है।
एक भक्तकवि के रूप में रसखान के पदों को देखा जाय तो उनकी भक्ति भगवान श्री कृष्ण के प्रति निवेदित होकर भी किसी सम्प्रदाय के सीमित क्षेत्र से सर्वथा पृथक, अत्यंत स्वच्छंद
और उन्मुक्त दृष्टिगत होती है। जब उन्हें चारों तरफ ढूँढने पर भी ब्रह्म नहीं मिलते हैं तब कलि-कुंज में जाकर राधा के पाँव पलोटते श्री कृष्ण के दर्शन करते हैं ऐसी ढिढाई उन्हें छोड़कर अन्य कवि ने कभी नहीं की होगी।
रसखान ने अपने आराध्य श्री कृष्ण की लीलाओं से सम्बद्ध पदों में
र अपने पदों में रसखान ने अपने आराध्य श्री कृष्ण की लीलाओं से सम्बद्ध पदों में जैसी सजीवता और सरसता ला दी है वैसी अन्यत्र देखने को नहीं मिलती है। उन्हें पाकर ब्रजभाषा भी अपने सहज माधुर्य लिये उनके साथ चलती दृष्टिगोचर होती है।
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि रसखान ब्रजभाषा के अकेले रससिद्ध कवि हैं जिन्होंने न केवल अपनी काव्य-भाषा ब्रजभाषा को कोमल और संगीतात्मक बनाया अपितु भक्ति के क्षेत्र में भी उनकी अपनी अलग लीक रही जिसमें तन्मयता. अनुभूतियों की गहराई, आत्मीयता आदि के दर्शन होते हैं।
