Nijman Ki Bitha Man Hi Rakho Goye Muhavare ka Arth निज मन की विथा मन ही राखो गोय मुहावरे का अर्थ। यह पंक्ति रहीम कवि रचित दोहे का अर्द्धाश है। इसमें कहा गया है कि अपने मन में यदि कोई व्यथा हो तो उसे गोय अर्थात् छिपाना चाहिए।
अर्थात् दूसरों को नहीं कहना चाहिए, उसे सार्वजनिक नहीं बनाना चाहिए। इसका कारण रहीम कवि ने बताया है कि अधिकतर लोग दु:ख सुनकर द्रवित होने के बदले उपेक्षा या उपहास करते हैं। कोई दु:ख-दर्द बाँटता नहीं।
Nijman Ki Bitha Man Hi Rakho Goye Muhavare ka Arth निज मन की विथा मन ही राखो गोय मुहावरे का अर्थ।
यदि इसे न भी मानें तब भी हर आदमी को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होती है। कोई किसी का बोझ नहीं उठाता है। पीड़ा कहने के मूल में सहयोग और सहानुभूति पाने का भाव होता है। जब वह न मिले तो बेहतर है कि न कहा जाये। सबके आगे रोते चलने वाले लोगों को लोग पसन्द भी नहीं करते हैं। अत: रहीम की दृष्टि में बड़प्पन इस बात में है कि दुख को पी लिया जाय। यह गंभीर पुरुष का लक्षण होता है।
