प्रश्न-1. कबीर रूढ़ियों और बाह्याडम्बरों के खिलाफ थे-पठित पदों के आधार पर स्पष्ट करें। अथवा, कबीर की पठित रचनाओं का केन्द्रीय भाव स्पष्ट करें अथवा, पठित पदों के आधार पर कबीरदास का काव्यगत परिचय दें। अथवा, पठित पदों के आधार पर कबीरदास की भक्ति-भावना का परिचय दें।
उत्तर-कबीर भक्तिकाल के अन्तर्गत ज्ञानमार्ग को अख्तियार कर उपनिषदों की अद्वैती भावना से प्रभावित होकर किन्तु अपने अनुभव के आधार पर कहीं अद्वैत और कही द्वैताद्वैत और कहीं विशिष्टाद्वैत की साधना को स्वीकार करते हुए निर्गुण और निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं। विरह उनकी भक्ति-पद्धति का प्रमुख अंग है तभी तो उनका ह्रदय जल बिन मछली की भाँति हमेशा आकुल-व्याकुल रहता है
Kabir Rudhiyon Aur Bahyadambar ke Khilaf the-pathit padon ke Aadhar par spasht karen
"तलफै बिन बालम मोर जिया ।।
दिन नहीं चैन रात नहीं निंदिया तलफ तलफ के भोर किया ।।
तन मन मोर रहे अस डोलै सूनसेज पर जनम छिया ||
नैन थकित भए पंथ न सूझै सांई बेदरदी सुध न लिया ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो हरो पीर दुख जोर किया ।।"
कबीर ने निर्गुण निराकार की उपासना प्राचीन परंपरा का अनुगमन करते हुए ही शुरू की थी क्योंकि उनकी दृष्टि में असीम की उपासना का वही एक मार्ग हो सकता था क्योंकि मूर्त पदार्थों को लेकर कई प्रकार के विरोध की संभावना उन्हें दिखायी देती रही हो। किन्तु उपासना के क्षेत्र में उनके उपास्य निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप साकार सगुण होता हुआ दृष्टिगत होता है। उनकी भाव-भगति प्रेम तत्व का संस्पर्श पाकर अत्यंत मधुर होती-सी प्रतीत होती है जिसपर हठयोग की स्पष्ट छाया देखी जा सकती है।
कबीरदास के काव्य में जिस रहस्यवाद के दर्शन होते हैं वह बौद्धिक और भावात्मक दो भागों में विभाजित दृष्टिगत होता है किन्तु बौद्धिक अथवा साधनात्मक रहस्यवाद में फैलने की बजाय वे उसे सुलझाने का यत्न करते हुए उसे न केवल युगानुरूप बनाते हैं बल्कि वैसे स्थलों पर उसे अपनी सरस अनुभूतियों से सम्पृक्त करते हुए आगे भावात्मक रहस्यवाद के अन्तर्गत स्वयं को एक साधक नारी के रूप में प्रस्तुत कर सदैव परमात्मा रूपी पुरुष के वियोग में अपनी भावुकतापूर्ण विरहाभिव्यक्ति करते हैं।
कबीर रूढ़ियों और बाह्याडम्बरों के खिलाफ थे-पठित पदों के आधार पर स्पष्ट करें।
कबीर अपनी भक्ति-पद्धति में आत्मज्ञान की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए ईश्वर-प्राप्ति के लिए अपनाये जानेवाले बाह्याडम्बरों से इन्कार करते हैं तभी तो वे कहते हैं
“पानी बिच मीन पियासी। मोहि सुनि-सुनि आवत हाँसी ।।
आतम ज्ञान बिना सब सूना क्या मथुरा क्या कासी ।।"
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि कबीरदास एक सच्चे भक्त हैं जिन्होंने प्रेम तत्व की तीव्रता को अपना काव्यसर्वस्व मानते हुए अपनी भावाभिव्यक्ति के माध्यम से परमात्मा के सान्निध्य को प्राप्त करने का उपक्रम किया।
कबीरदास कहते हैं कि परमात्मा रूपी बालम के वियोग में ह्रदय बेचैन रहता है न दिन को चैन रहता है और न रात को ही, बेचैनी में ही भोर हो जाता है। यह मन सदैव रहट की भाँति हिलता-फूलता रहता है। सेज तभी से सूनी है जब से उसने इस संसार में जन्म-ग्रहण किया है। नेत्र उनकी ओर लगे-लगे थक गए हैं अब यह भी नहीं दिखायी देती और बेदर्दी बालम को उसकी सुधि लेने की जरा भी फिक्र नहीं है।
कबीरदास कहते हैं कि विरह-दुःख अत्यधिक बदल गया है इसलिए वह हरा जाना चाहिए, दूर किया जाना चाहिए।
कबीरदास कहते हैं कि करम की गति अटल है। मुनि बसिष्ठ द्वारा काफी शोध करने के पश्चात मुहूर्त निकाला गया था फिर भी सीता का हरण हुआ और दशरथ मृत्यु को प्राप्त हुये।
रिश्चन्द्र को एक डोम के हाथ बिकना पड़ा
जाल कहीं बिछाया गया था और सागर कहीं था जबकि मृग कहीं और सागर कहीं था जबकि मृग कहीं और चर रहा था। नतीजतन रावण के द्वारा सीता हरी गयी तत्पश्चात लंका का नाश हुआ। इसी प्रकार हरिश्चन्द्र को एक डोम के हाथ बिकना पड़ा, बलि को पाताल जाना पड़ा।
यहाँ तक कि करोड़ों गायें दान करते हुए भी राजा को गिरगिट में जन्म लेना पड़ा। पांडव जिनके सारथी स्वयं भगवान कृष्ण थे उनपर भी विपत्ति आयी। दुर्योधन का गर्व चूर हुआ और यदु कुल का नाश हुआ। संयोग पाकर ही राहुकेतु सूर्य-चन्द्रमा को ग्रस लेते हैं।
महाकवि कबीर
तात्पर्यतः होनी अटल है जिसे चाहकर भी नहीं टाला जा सकता है। महाकवि कबीर का मानना है कि ब्रह्म का निवास स्थान आकाश है, शून्य है जो अनन्त, असीम और अखंड है। कवि कहता है कि आकाश में बादलों की गर्जना हो रही है।
बादल पूरब दिशा से घिर आये हैं और रिमझिम वर्षा भी होने लगी हैं। वर्षा के पानी से टूट रही मेड़ों को ठीक करते अपने-अपने खेत में किसान दिखायी देने लगे हैं। ठीक यही स्थिति साधक के साथ भी है जो ब्रह्म की सुनायी देनेवाली अनहद ध्वनि को समेट रहे हैं।
साधक की मूक वाणी खेतस्वरूप है जैसे उसका मन रूपी बैल हल से जोतता है जिसका हलवाहा सुरति है। जिस प्रकार एक किसान अपने खेत से अनावश्यक घासपात को निकाल बाहर कर खेत में बीज डालता है उसी प्रकार साधक भी द्विविधा रूपी घासपात को निकाल बाहर कर अपने मौन रूपी खेत में सतगुरु रूपी धान का बीज बोता
है फिर उसके अंकुरित और पल्लवित होने पर उसकी रखवाली करता है तत्पश्चात ज्ञानस्वरूप अपनी फसल को बाली से प्राप्त अनाज का संचय करता है और यह संचय उसके हृदयरूपी घर में किया जाता है जिसको पाँच तत्वों में से जो पकायेगा वही मुनि और ज्ञानी की थालियों में भी बराबर परोसेगा और ज्ञानी वही कहा जायेगा
जो निरवानी का अर्थ लगायेगा। जिसे ज्ञान का परिचय प्राप्त होगा वही विज्ञानी कहलायेगा। कबीर का मानना है कि ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, वह घट-घट का वासी है फिर यह कितनी हास्यास्पद बात है कि मछली रूपी जीव संसार-सागर में रहकर भी स्वयं को भ्रम की मरीचिका में रखकर प्यासी रहे।
परमात्मा का सानिध्य
वस्तुतः आत्मज्ञान के अभाव में परमात्मा की खोज अथवा परमात्मा का सानिध्य मथुरा-काशी की तीर्थयात्राएँ करने से नहीं प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी तीर्थयात्राएँ करने वालों को अपने अन्तस में बसे ईश्वर के दर्शन हो ही नहीं सकते क्योंकि उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त नहीं है।
जो आत्मज्ञान रहित होते हैं वे उस मृग की भाँति होते हैं जो अपनी नाभि में कस्तुरी की विद्यमानता से अनभिज्ञ होने के कारण यत्र-तत्र सुगंधि के स्रोत की तलाश करता है। अंत में कबीर कहते हैं कि आत्मज्ञान प्राप्त होने पर जीव द्वारा अविनासी' अथवा अनश्वर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता है।
कबीरदास कहते हैं कि योगियों का मन तन पर गेरुआ वस्त्र धारण करने मात्र से नहीं रंगाता है और न मंदिर में आसनस्थ होकर पत्थर को पूजने से ईश्वर की समीपता प्राप्त होती है बल्कि ईश्वर का सानिध्य उसके नाम को समझने से ही प्राप्त किया जा सकता है। कान फड़वाकर, जटा-दाढ़ी बढ़ाकर जंगल में धुनि रमाकर और काम को जलाकर, माथा मुड़ाकर गीता बाँचने से नहीं।
कबीरदास कहते हैं कि जो नाम के महत्व को नहीं समझते हैं वे यमराज-द्वार पर बँधे पहुंचते हैं। कबीरदास कहते हैं कि जीव का शरीर आत्मा का आवरणमात्र है जो आत्मा के लिए चादर सद्दश है
कबीर रूढ़ियों और बाह्याडम्बरों के खिलाफ थे-पठित पदों के आधार पर स्पष्ट करें।
जिसमें अनगिनत रंध्र हैं। इस चादर की निर्मिति में ईश्वर को दस महीने लगते हैं। जिस प्रकार चादर की निर्मिति में ताना-भरनी का विशेष
महत्व होता है उसी प्रकार शरीर रूपी चादर का निर्माण इंगला और पिंगला की तानी और सषुम्ना के तार की भरनी के सहयोग से किया जाता है। इस शरीर के अन्दर ह्रदय का जो आकार दिखायी देता है वह अष्टदल कमल सदृश है जिसके स्पंदित रहने अर्थात् चरखे की भाँति डोलने से ही
आजीवन रक्त शरीर के प्रत्येक कोषाणु को प्राप्त होता रहता है। पाँच तत्व एवं त्रिगुणों से ही शरीर की संरचना होती है जिनके कारण ही कोई सदाचारी होता है, कोई विलासी तो कोई स्वार्थी और दुर्व्यसनी हो जाता है। ईश्वर दस महीनों में काफी ठोक-बजाकर करता है। वह शरीर अंत में पुनः
ईश्वर को प्राप्त हो जाता है। कबीरदास कहते हैं कि जिस चादर को देवताओं, मुनियों और मनुष्यों ने ओढ़कर मैली कर दी उस चादर को कायदे से ओढ़कर उसे कबीर ने ज्यों की त्यों अर्थात् बिना मैली किये रख दी।