इसमें पंडिताई की कसौटी के रूप में प्रेम को प्रस्तुत किया गया है। सामान्यत: माना जाता है कि जो अपने विषय से संबंधित ग्रंथों का अध्ययन कर उस विषय का अधिकारी ज्ञाता हो जाता है वह पंडित कहलाता है।
Dhai aakhar prem ka padhe so pandit hoy ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।
लेकिन कबीर की दृष्टि में इस तरह का शुष्क ज्ञान पांडित्य नहीं है। किसी विषय का ज्ञाता होना काफी नहीं है। उसके साथ व्यक्ति में संवेदना और सहानुभूति का गुण होना चाहिए, मनुष्यता होनी चाहिए। जो ज्ञानी व्यक्ति जाति, धर्म, ऊँच, नीच धनी-गरीब आदि का भेद हटाकर सबसे प्रेम करता है वही असली पंडित है।
एक वाक्य में कबीर की दृष्टि में वही ज्ञानी पंडित है जो प्रेम करने की पात्रता रखता है। अर्थात् असली पढ़ाई प्रेम की पढ़ाई है, मनुष्यता की पढ़ाई है।
