हारे को हरिनाम मुहावरे का अर्थ | Hare ko harinam Muhavare ka Arth

हारे को हरिनाम मुहावरे का अर्थ | Hare ko harinam Muhavare ka Arth. मनुष्य स्वभाव से पुरुषार्थी होता है। अपनी शारीरिक क्षमता और बुद्धि के सहारे वह संघर्ष कर जीवन समर जीतना चाहता है। इस समर में वह कभी जीतता है तो कभी हारता है।

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हारे को हरिनाम मुहावरे का अर्थ | Hare ko harinam Muhavare ka Arth

लेकिन जबतक उसकी बुद्धि सही रहती है और शरीर में ताकत रहती है तबतक वह हार नहीं मानता है लेकिन जब बार-बार हारता है तो एक समय आता है कि वह शिथिल हो जाता है। उस समय उसे किसी अतिरिक्त शक्ति स्रोत से प्रेरणा या शक्ति ग्रहण करने की आवश्यकता होती है। 

जैसे हमारे पास पूँजी नहीं होती है तो हाथ पर हाथ धरकर बैठने के बदले कहीं से कर्ज लेते हैं और उस कर्ज से धन कमाकर कर्ज भी लौटा देते हैं और पूँजी भी खड़ी कर लेते हैं। मनुष्य के लिए ईश्वर का नाम स्मरण करना ऐसा ही शक्ति-स्रोत है, पूँजी कोष है। 

हारे को हरिनाम मुहावरे का अर्थ | Hare ko harinam Muhavare ka Arth

वह हारने पर ईश्वर से प्रार्थना करता है। उनसे दया की भीख मांगता है, जीतने के लिए शक्ति का वरदान चाहता है। इससे भिन्न यदि वह पूर्णतः पराजित हो कर शिथिल और असहाय हो जाता है तो उस समय भी वह ईश्वर की शरण में चला जाता है। 

संसार से विरल होकर अपना जीवन ईश्वर की पूजा-उपासना और भक्ति में बिता देता है। इस तरह बात चाहे शक्ति पाने की हो चाहे शरणागति की दोनों ही अवस्था में हारे व्यक्ति को हरि का नाम ही अंतिम सहारा देता है। इसीलिए कहा जाता है-हारे को हरिनाम।


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