आगे नाथ न पीछे पगहा मुहावरे का अर्थ | Aage Nath na Piche Pagaha. पालतू पशुओं विशेषकर गाय, बैल भैस को बाँधकर और नियंत्रण में रखने हेतु उनकी नाक में नाथ पहनाया जाता है तथा गले में रस्सी अर्थात् पगहा डालकर उन्हें खूटे से बाँधा जाता है। इस तरह नाथ और पगहा पशुओं को बन्धन में रखने तथा पालतू बनाये रखने के उपादान हैं, प्रतीक हैं।
आगे नाथ न पीछे पगहा मुहावरे का अर्थ | Aage Nath na Piche Pagaha
इसी तरह सामाजिक संदर्भ में पारिवारिक स्तर पर व्यक्ति को घरेलू बनाये रखने हेतु दो बन्धन होते हैं-माता-पिता और पत्नी-बच्चे। माता-पिता के प्रति दायित्वपूर्ण होने के कारण व्यक्ति उनके जीवन काल तक गृहस्थ जीवन जीने के लिए नैतिक रूप से बाध्य होता है। अतः हम माता-पिता को नाथ मान सकते हैं। वैसे ही पत्नी और बच्चे के प्रति प्रेम अथवा दायित्व के कारणव्यक्ति परिवार से बँधा होता है।
अत: पत्नी-बच्चे को पगहा कह सकते हैं। जिस व्यक्ति के इन चारों में से कोई नहीं होता है वह नाथ पगहा विहीन अर्थात् मुक्त होता है। अपनी मरजी का स्वामी होता है। अत: जिस व्यक्ति के माता-पिता स्वर्गीय हो जाते हैं और पत्नी-बच्चे नहीं होते हैं उनके विषय में प्रायः यह लोकोक्ति कही जाती है कि उसके न आगे नाथ न पीछे पगहा।
