Yasodhara यशोधरा के निर्धारित पाठ्यांशों के सारांश
1. Ghoom raha hai Kaisa Chakr घूम रहा है कैसा चक्र
सिद्धार्थ साश्चर्य चिन्तन करते हैं कि संसार में कैसा चक्र चलता दिखायी दे रहा है जिसमें पिसती हुई मनुष्य-सृष्टि कबतक विनाश को प्राप्त होती रहेगी, मनुष्य-सृष्टि कबतक दुर्गति को सहती हुई पतनोन्मुख होती रहेगी मनुष्य-सृष्टि की इस दुर्गति से छुटकारा पाने के लिए किन देवों को गाया जाय और किनको रोया जाय या फिर अपना कुशल मनाया जाय।
संसार में दिखायी देने वाली हरेक वस्तु क्षणिक है, नश्वर है। दु:ख रूपी मगर के वश में सारा संसार कब तक पड़ा रहेगा। इस प्रकार संसार की परिवर्तनशीलता, असारता और नश्वरता से संवेदित और आंदोलित होते सिद्धार्थ उससे मुक्ति हेतु चिन्तामग्न और आकुल होते हैं।
सिद्धार्थ सोचते हैं कि मुक्ति के लिए क्या उपाय हो तत्पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि उससे मुक्ति तभी संभव है जब उस दु:ख रूपी मगर के दाँत उखाड़े जाएँ जिससे सारा संसार संत्रस्त है तभी संसार को स्वर्ग में ले जाया जा सकता है इसी दिशा में सिद्धार्थ को स्वर्ग में ले जाया जा सकता है इसी दिशा में सिद्धार्थ का चिन्तन सतत चलता रहता है।
लिए इस सूने भव यानी असार संसार सागर को पार करना अर्थात् जीवन के लिए दृष्टिगत होनेवाले उन अभिशापों से ऊपर जाना अत्यंत आवश्यक है जो मनुष्य से उसका जीवन छीनकर मिट्टी में मिला देता है।
2. Dekhi Maine Aaj Jra देखी मैने आज जरा
जरा यानी बुढ़ापा को लेकर चिन्तामग्न सिद्धार्थ को बुढ़ापा को प्राप्त होती हुई Yasodhara का अनुमान होता है तब वे साश्चर्य चिन्तन-क्रम में ही कहते हैं कि क्या मेरी Yasodhara भी एकदिन बुढ़ापे को प्राप्त हो जाएगी। अपनी पत्नी का वह सौन्दर्य जो उन्हें प्रिय रहा है, के मिट्टी में मिल जाने का अनुमान कर वे अत्यंत ही दु:खी होते हैं
और अपना हरा-भरा उपवन उन्हें मिट्टी में मिलता हुआ दिखायी देने लगता है तो कभी वे रोग-व्याधियों को सहने के लिए मनुष्य को पशुवत विवश पाकर दु:खी होते हैं। तत्पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि यह संसार जो बाहर से भले ही भरा हुआ दिखायी देता है किन्तु अन्दर से खोखला और खाली-खाली है ऐसे में मनुष्य-जीवन के
लिए इस सूने भव यानी असार संसार सागर को पार करना अर्थात् जीवन के लिए दृष्टिगत होनेवाले उन अभिशापों से ऊपर जाना अत्यंत आवश्यक है जो मनुष्य से उसका जीवन छीनकर मिट्टी में मिला देता है।
3. Marane Ko jag Jita Hai मरने को जग जीता है
सिद्धार्थ का युवा-मन मृत्यु को प्राप्त होते मनुष्य को देखकर चिन्ताओं से भर जाता है। अपने चिन्तन के क्रम में वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सम्पूर्ण जगत मृत्यु को प्राप्त होने के लिए ही जैसे जीवन को जीने के लिए विवश होता है। उन्हें असंख्य छिद्रों वाले घड़े जैसा प्रतीत होता है जो भरा हुआ होकर भी खाली-खाली है
जिसका अन्त कब हो जाय कहा नहीं जा सकता और यह भी नहीं बताया जा सकता है कि किसका समय कहाँ आ बीता है ऐसे में उन्हें सत्य केवल विष ही लगता है जिसे मनुष्य द्वारा रस समझकर पिया जाता है। उन्हें आश्चर्य यह सोचकर होता है कि चेतन प्राणी होकर मनुष्य अपनी चेतना की उपेक्षा करता है
जो उसके लिए कहीं से उचित नहीं है। अन्तत: वे स्वयं की चेतन-शक्ति को उस ओर लगाकर गृह-त्याग का निर्णय लेकर संसार को निर्भय रहने का संदेश देते हुए मनुष्य को सुगति दिलाने के लिए गीता अर्थात् ज्ञान की खोज में निकल पड़ते हैं।
4. Ao Kshanabhangur Bhav Ram Ram ओ क्षणभंगुर भव राम राम
अपने महाभिनिष्क्रमण से पूर्व सिद्धार्थ के सम्मुख कई प्रश्न खड़े होते हैं जो उनसे जबावतलब करते हैं। एक प्रश्न उनके मन में यह उठता है कि क्या गृह-त्याग के लिए पत्नी या माता से आज्ञा लें? दूसरा प्रश्न उनके अन्तस् में यह उठता है कि कहीं वे परिवार-संसार को भार समझकर तो गृह-त्याग नहीं कर रहे हैं ?
यह सही है कि उनका महाभिनिष्क्रमण संसार के कल्याण के लिए होता है किन्तु इस बात को लेकर वे अत्यंत चिंतित हैं कि कहीं उनके महाभिनिष्क्रमण को लोग पलायन से संज्ञापित तो नहीं करेंगे यह चिन्ता उन्हें बहुत परेशान करती है जबकि उनके द्वारा महाभिनिष्क्रमण का निर्णय संसार को जिन दुःखों से उबारने के लिए लिया गया था वह दु:ख पूरे संसार का है न कि उनका व्यक्तिगत दु:ख था।
उनके अंतस् में राग-विराग का द्वन्द्व अनवरत चलता है। किन्तु वे भवभुक्ति को छोड़ मुक्ति के लिए स्वयं को कृतसंकल्प करते हैं। उन्हें संसार असार और नश्वर मालूम होता है।
बुढ़ापा, रोग और अंत में मरण को प्राप्त होते सांसारिक प्राणियों के दु:ख से दु:खी सिद्धार्थ समस्त सुख-सुविधाओं को त्यागकर प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प हैं जिसके लिए ही उनका महाभिनिष्क्रिमण होता है।
5. Siddhi Hetu Svami Gae. सिद्धि हेतु स्वामी गये
Yasodhara अपने स्वामी का स्वागत करने के अधिकार से अपने ही पति द्वारा वंचित कर दिये जाने के कारण स्वयं को अपमानित, तिरस्कृता और उपेक्षिता महसूस करती है जबकि उसे इस बात को लेकर गौरव है कि उसके स्वामी का वनगमन सिद्धि-प्राप्ति के लिए हुआ है
किन्तु उसे दु:ख केवल इसी बात का है कि उसके स्वामी चोरी-छिपे क्यों गये क्या उन्होंने उसे अपने पथ की बाधा समझकर ऐसा किया या फिर उसके स्वामी ने उसे पहचाना नहीं कि वह क्षत्राणी है जो अपने पतियों को वीरोचित परिधान से सुसज्जित कर माथे पर तिलक लगाकर रणक्षेत्र के लिए विदा करती हैं।
Maithili Sharan Gupt...... Rachit Yashodhara
निश्चित रूप-स्वामी ने उसे पहचानने में कहीं भूल अवश्य की है जबकि उसके लिए स्वामी की इच्छा ही सर्वोपरि रही है। आज भला वह किस बात को लेकर गर्व करे जिसके द्वारा वह अपनायी गयी उसी ने उसे त्याग दिया। आज उसकी आँखों से आँसू बहते हैं उन्हें वे सहन नहीं होते। एक भारतीय नारी होने के नाते वह अपने स्वामी की सिद्धि के लिए मंगलकामना करती है।
6. Ab kathor Hi Vajraadapi अब कठोर ही वज्रादपि
Yasodhara का नारी-व्यक्तित्व स्त्रियोचित कोमलता और आत्माभिमानजनित कठोरता से निर्मित हुआ है। वह अपने स्वामी के प्रति एक समर्पिता पत्नी के रूप में यदि कुसुम की भाँति कोमल और सुकुमार है तो स्वामी का स्वागत करने के अधिकार से वंचित कर दी गयी नारी के