Sankshepan Ki Paribhasha | Condensation | संक्षेपण की परिभाषा. संक्षेपण वह रचना-रूप है जिसमें समास-शैली के माध्यम से किसी रचना का सार-तत्त्व लगभग एक-तिहाई शब्दों में उपस्थित किया जाता है।
मतलब यह है कि किसी भी लम्बे कथन को जब हम संक्षिप्त कर श्रोता के समक्ष या पाठक के समक्ष उपस्थित करते हैं, तो वही संक्षेपण की क्रिया कहलाती है।
मतलब यह है कि किसी भी लम्बे कथन को जब हम संक्षिप्त कर श्रोता के समक्ष या पाठक के समक्ष उपस्थित करते हैं, तो वही संक्षेपण की क्रिया कहलाती है।
किसी भी विचार को अभिव्यक्त करने की दो शैलियाँ होती हैं - व्यास-शैली और समास शैली। जब हम अपने विचारों को विस्तार के साथ स्पष्टतः अभिव्यक्त करते हैं तो वह व्यास-शैली कही जाती है। परन्तु किसी के विचारों को जब हम छोटा कर स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं, तो वह समास-शैली कही जाती है। संक्षेपण के लिए इसी समास-शैली का प्रयोग किया जाता है।
प्रायः देखा जाता है कि परीक्षाओं में विद्यार्थी संक्षेपण करते वक्त सिर्फ तिहाई करने के ख्याल से ऊपर, बीच और नीचे के कुछ वाक्यों को उठाकर तिहाई की संख्या पूरी कर देते हैं और समझते हैं कि संक्षेपण पूरा हो गया। परन्तु ऐसा समझना भारी भूल है।
Sankshepan Ki Paribhasha | Condensation | संक्षेपण की परिभाषा
Sankshepan ka mahatva | Importance of Abbreviation | संक्षेपण का महत्त्व
किसी भी बात को संक्षेप में इस प्रकार बोला या लिखा जाए कि सुनने या पढ़नेवाला उन तमाम बातों का सही-सही अर्थ लगा ले और मूल का कोई अनिष्ट भी न हो, संक्षेपण भी कला है। यह कला संस्कृत की सूक्तियों में, उर्दू शायरी में तथा हिन्दी एवं अंग्रेजी के कुछ उच्च कोटि के लेखकों में देखी जा सकती है।
इस दृष्टि से बिहारीलाल सर्वश्रेष्ठ माने जा सकते हैं –'सतसइया के दोहरे अरु नावक के तीर, देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर। हिन्दी के कथा-सम्राट् प्रेमचंद की शैली में भी संक्षिप्ता का चमत्कार बरकरार है।
पाश्चात्य दार्शनिकों और साहित्यकारों ने भी संक्षिप्ता की शैली को एक गुण माना है। होरेस के कथनानुसार, 'व्यर्थ शब्द केवल उसी की लेखनी से निकलते हैं, जिसकी स्मृति में बहुत अधिक अनावश्यक बातें भरी होती हैं।'
ध्यातव्य है कि श्रेष्ठ लेखक वह नहीं है जो जानता है कि क्या लिखना चाहिए, बल्कि वह है, जो जानता है कि क्या नहीं लिखना चाहिए। संक्षेपण एक प्रकार की साहित्यिक मितव्ययिता है। इसलिए इसके महत्त्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
Sankshepan Ki Paribhasha | Condensation | संक्षेपण की परिभाषा
संक्षेपण भाषा-शिक्षण का एक अत्यन्त मूल्यवान अंश है। इसके द्वारा विद्यार्थियों की मानसिक योग्यता, ग्राहिका-शक्ति और अभिव्यंजना-शक्ति की सम्मिलित परीक्षा हो जाती है। संक्षेपण हमारी अभिव्यक्ति क्षमता को नियंत्रित कर उसे अधिक प्रभावपूर्ण एवं उपयोगी बना देता है।
संक्षेपण एक मानसिक अनुशासन है। यह हमें ग्रहणशील पाठक बनाता । हमारी विवेक-शक्ति को जागृत करता है, और हमारी अभिव्यंजना को निखार देता है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार कम शब्दों में, प्रवाहपूर्ण शैली में, तटस्थ भाव से अपने या दूसरों के विचारों को उपस्थित किया जा सकता है।
यह हमारे चिंतन को चुस्त बनाता है और अनर्गल प्रलापों से बचाता है। लेखन और अध्ययन में तथा जीवन के अन्य क्षेत्रों में, ये गुण कितने लाभदायक हैं, अनुभव से ही जाना जा सकता है।
Sankshepan ke Udaharan | संक्षेपण के उदाहरण
'भारतीय सभ्यता, दर्शन और प्राकृतिक सौन्दर्य पर विदेशी सदैव मुग्ध रहे हैं, पर आज न भौतिक समृद्धि में और न ज्ञान के क्षेत्र में हमारा कोई महत्वपूर्ण स्थान है। जिसके आँगन में मानवता खेली, जहाँ उन्होंने संस्कार प्राप्त किया, जहाँ प्रथम ज्ञानोदय हुआ, जहाँ का प्रकाश पाकर दुनियाँ प्रकाशित हुई, उसी देश में हम नंगे, भूखे, निरक्षर और परमुखापेक्षी अधिवासी हैं।
हमने अपने पूर्वजों के गौरव को हास्यास्पद बनाया, हमने एक महती संपदा प्राप्त कर लिया-उसका उपयोग न जाना, हमने दुनिया में अपनी और अपने देश की सुनी। क्या देश को हम पर अभिमान होगा ? क्या अपमान हम अनुभव करते हैं ? हमें आज प्रतिज्ञा करनी होगी कि हम अपने देश की महान परम्परा को कायम रखेंगे और अपने को उसके गौरव के अनुरूप बनायेंगे। (शब्द संख्या-132)
Shirshak-hamara Adhopatan | Title - Our Downfall | शीर्षक-हमारा अधोपतन
'भारतीय सभ्यता, दर्शन और प्राकृतिक सुषमा पर विदेशी मुग्ध थे। ज्ञान की रश्मियाँ यहीं फूटीं। आज हम पिछड़े हुए हैं, उपेक्षित और दुर्गत हैं। प्राचीन गौरव विस्मृत हो गया है। हमें राष्ट्रीय गौरव और परम्परा के उत्थान की प्रतिज्ञा लेनी होगी।' (शब्द संख्या-44)
'मनुष्य सुख की खोज में आदिकाल से रहा है और इसी की प्राप्ति उसके जीवन का सदैव मुख्य उद्देश्य रहा है। दुख से वह इतना घबराता है कि इस जीवन में ही नहीं, आनेवाली जीवन के लिए भी ऐसी व्यवस्था करना चाहता है कि यहाँ भी सुख का उपभोग कर सके।
जन्नत और स्वर्ग, मोक्ष और निर्वाण सब उसको आकांक्षा की रचनाएँ हैं। सुख की प्राप्ति के लिए ही हमने जीवन को निस्सार और संसार को अनित्व कह कर अपने मन को शान्त करने की चेष्टा की है। तब जीवन में कोई सार ही नहीं और संसार अनित्य ही है तो फिर क्यों न इनसे मुँह मोड़ बैठे ? लेकिन हम क्यों दुखी होते हैं. यह कौन-सी मनोवृति है जो दुख को ओर ले जाती है, उस समय हमने विचार नहीं किया।
Shirshak-sukh ki sadhana | Title - Sadhana of Pleasure | शीर्षक-सुख की साधना
'दु:ख से छुटकारा और सुख की प्राप्ति आदिकाल से मनुष्य का उदय है. मरणोपरांत सुखोपलब्धि के लिए उसने स्वर्ग और मोक्ष की कल्पना की तथा अनित्य जीवन की शिक्षा दी। पर दु:ख के कारण की विवेचना हम आज तक नहीं कर सके' (शब्द संख्यां -44)
मनुष्य समाज का वर्णन सभी देशों के शास्त्रकारों ने विराट पार किया है। उन्होंने समाज के भिन्न-भिन्न अंगों की उपमा शरीर के अंगद उन्नाय है कि जिस प्रकार सारे शरीर की स्थिरता समृद्धि, उन्नति के लिए प्रत्येक का निधान्त काम करते जाना आवश्यक है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न अंगों का भी अपना-अपना कद पलमारतहमा
Ba part 3 Hindi honors .......... Question-Answer
समाज के जीवन को बनाये रखने के लिए आवश्यक है। वे बतलाते हैं कि एक माकी शनि हालसे सबकी हानि होती है। यदि पैर में चोट लग जाये तो सारे शरीर को कार होता है को नहीं। यदि हाथ में साँप काट ले तो सारा शरीर मर जाता है केवल हाथ नहीं
प्रकार सारे शरीर की स्थिभिन्न अंगों की उपमा के शास्त्रकारों के किन के जीवन है, उसी प्रकार का समृद्धि, उन्नति शरीर के - हानि होती है। बनाये रखने के लिभिन्न अंगों का भी प्रकार क्या है। मैं साँप काट ले में चोट लग जाये तक है। वे बतलाते है कि (शब्द संख्यां -126)
शीर्षक-समाज और शरीर | Shirshak-Samaaj Aur Sharir
'शास्त्रकारों ने समाज की तुलना शरीर से की। समाज के भी विभिन्न अंग हैं। इनकी सक्रियता से ही शरीर का विकास होता है। किसी अंग की क्षति से समस्त शरीर की हानि होती है। समाज का भी यही हाल है।'
(शब्द संख्या-41)
किसी भी देश की संस्कृति जानने के लिए वहाँ के साहित्य का पूरा अध्ययन नितांत आवश्यक है। साहित्य किसी देश तथा जाति के विकास का चिह्न है। साहित्य से उस जाति के धार्मिक विचारों, सामाजिक संगठन, ऐतिहासिक घटना चक्र तथा राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंव मिल जाता है।
भारतीय संस्कृति के मूल आधार हमारे साहित्य के अमूल्य ग्रन्थ रत्न हैं जिनके विचारों से भारत की आंतरिक एकता का ज्ञान हो जाता है। हमारे देश की बाहरी विविधता भारतीय वाङ्मय के रूप में बहनेवाली विचार और संस्कृति की एकता को ढंक लेती है। वाङ्मय की आत्मा एक है, पर वह अनेक भाषाओं, रूपों तथा परिस्थितियों में हमारे सामने आती है। (शब्द संख्या-106)
शीर्षक-संस्कृति और साहित्य | Shirshak-Sanskrti Aur Saahity
राष्ट्र की संस्कृति, राजनीति, धर्म, समाज, इतिहास आदि तत्व साहित्य में प्रतिच्छेदित होते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में, वाह्य विविधताओं के होते हुए भी भारतीय संस्कृति में मूलभूत ऐक्य भावना का निदर्शन प्राप्त होता है।
(शब्द संख्या-30)
जिस मनुष्य ने बिना किसी संशय के स्थिर निर्णय कर लिया और जो शहद की मक्खियों की भाँति उनके पीछे पड़ गया, वही अपने ध्येय तक पहुँच सका है। जिसका चित्त दोलायमान है, जिसके हृदय में संशयरूपी कीड़ा वर्तमान है, जिसे सदा एक ओर का पलड़ा भारी दिखाई पड़ता है
जिसे अपनी बुद्धि पर भी विश्वास नहीं है, उसकी कोई वक्त नहीं और न वह इस संसार । में कुछ कर ही सकता है। उसका कोई भरोसा नहीं करता, क्योंकि सब को यही आशंका बनी रहती है कि वह किसी क्षण अपना मत बदल सकता है। मनुष्य की सबसे बड़ी दौलत प्रत्युत्पन्न-मतित्व है।
शीर्षक-सफलता का रहस्य | Shirshak-Saphalata ka Rahasy
मनुष्य सुदृढ़, संकल्प और अध्यवसाय से लक्ष्य प्राप्त करता है। विकल्प, अनिश्चय और संशय में अस्थिर व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। वह आस्था का पात्र नहीं बन पाता। प्रत्युत्पन्नमतित्व व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ पुरूषार्थ है।
(शब्द संख्या-44)