Siddh Sahitya, Nath Sahitya | सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य

Siddh Sahitya, Nath Sahitya | सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य. A branch of Buddhism called Vajrayana. The scholars of this branch are called Siddhas. The number of Siddhas is stated to be eighty-four. The literature written by these Siddhas to propagate the Vajrayana element of Buddhism was called Siddha literature.

Siddh Sahitya, Nath Sahitya | सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य

Matsyendranath (Machindarnath) and Gorakhnath (after whom the city of Gorakhpur is named) started Nathpantha in response to the Siddhas' left-handedness Bhogpradhan Yoga-Sadhana. Gorakhpur has a very large Gorakhnath temple. Nathpanth Siddhas

Siddh Sahitya सिद्ध साहित्य

बौद्ध-धर्म की एक शाखा वज्रयान कहलाई। इस शाखा के विद्वान सिद्ध कहलाए। सिद्धों की संख्या चौरासी बताई गई है। इन सिद्धों ने बौद्ध-धर्म के वज्रयान तत्त्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य जनसभा में लिखा वह सिद्ध-साहित्य कहलाया।

सिद्धों के नामों के आगे आदरार्थ 'पा' जोड़ा जाता है, जैसे सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा, आदि। सरहपा कृत 'दोहाकोश' तथा शबरपा कृत 'चर्यापद' सिद्ध-साहित्य के प्रमुख ग्रंथ हैं। सिद्ध साहित्य का प्रभाव भक्तिकाल तक, विशेषतः संत साहित्य पर दिखाई देता है।

Nath Sahitya नाथ साहित्य

सिद्धों की वाममार्गी भोगप्रधान योग-साधना को प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में मत्स्येन्द्रनाथ (मछन्दरनाथ) तथा गोरखनाथ (जिनके नाम पर गोरखपुर शहर बसा है) ने नाथपंथ चलाया। गोरखपुर में बहुत बड़ा गोरखनाथ का मंदिर है। नाथपंथ सिद्धों का ही सुधरा हुआ रूप है। नाथों की संख्या नौ बताई गई है। इन नाथों द्वारा रचित प्रचारात्मक साहित्य नाथ-साहित्य कहलाया।

नाथ-साहित्य के आरंभकर्ता हैं-गोरखनाथ। इनकी चौदह रचनाएँ बताई जाती हैं। डॉ० बड़श्वाल ने 'गोरखबानी' नाम से इनकी रचनाओं का एक संकलन संपादित किया है। इनके साहित्य में लोक नीति और साधना की व्यापकता है। गुरू गोरखनाथ ने सहयोग का उपदेश दिया था। 'ह' का अर्थ है 

सूर्य और 'ठ' का अर्थ है चंद्र। इन दोनों के योग को ही 'हठयोग' कहते हैं। गोरखनाथ ने ही षट्चक्रों वाला योगमार्ग हिन्दी-साहित्य में चलाया था। गोरखनाथ ने लिखा है कि धीर वही है जिसका चित्त विकृत न हो 


नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा।
ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसे भंडारा।। स्पष्ट है कि खड़ी बोली की झलक गोरखनाथ की रचनाओं में मिलती है, इसीलिए इन्हें हिंदी का आदि कवि कहा जाता है। - इसी परंपरा का विकास भक्तिकाल के कवि कबीर में मिलता है।

अन्य प्रसिद्ध नामपंथी कवि हैं- चौरंगीनाथ, गोपीचंद, भरथरी (भर्तृहरि) आदि। इन सभी कवियों ने प्रायः गोरखनाथ का ही अनुसरण किया है।
I am a student web designer, I can give you a WordPress website by designing a professional website and if you want to see what website I design, Click on this link. click here website demo

Post a Comment

© Kiss Shayari. All rights reserved. Distributed by StatusClinic