Ritimukt Kavy Dhara, Ritisidth Kavy Dhara, Bihari ki Kavy Kla. Most of the poetry of Reetikal has been composed on the ritual pattern, but in this period there were poets who did not write any characteristic texts like Keshavdas and Chintamani.
There were also poets in Reetikal who, despite adopting the tradition of poetry, did not write signs, but showed their talent through independent and original poetic works.
Ritimukt Kavy Dhara, Ritisidth Kavy Dhara, Bihari ki Kavy Kla
Bihari was born in Gwalior. Bihari had studied the poetry of Sanskrit, Prakrit, under his father Guru Narharidas. He also practiced Persian poetry. He was a benefactor of Shah Jahan and used to get his stipend from many residents like Jodhpur, Bundi, etc.
Ritimukt Kavy Dhara रीतिमुक्त काव्य-धारा
Ans. रीतिकाल का अधिकांश काव्य रीतिबद्ध परिपाटी पर रचा गया है, परंतु इस काल में ऐसे कवि भी हुए जिन्होंने केशवदास और चिंतामणि की तरह कोई लक्षण ग्रंथ नहीं रचा
और न ही बिहारीलाल की तरह कोई रीतिबद्ध रचना की।
धनानंद, आलम, बोधा और ठाकुर आदि ऐसे ही कवि हैं। इन्होंने युगीन रूढ़ि- पालन का निर्वाह न करते हुए, अपनी स्वच्छंद भावनाओं-अनुभूतियों को सरस कवित-सवैयों में अभिव्यक्त किया। प्रेम और अनुराग के चित्र यहाँ भी हैं, किंतु इनमें वाक्-चातुर्य की जगह हृदय की सहजता और सरसता है। स्थूल रूप-चित्रण के साथ-साथ इन्होंने आंतरिक भाव-सौंदर्य का भी चित्रण किया। धनानंद रचित निम्नलिखित सवैया देखें:
पहिलें घन-आनँद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार पगी। अब लाय वियोग की लाय बलाय बढ़ाय बिसास दगानि दगी। अँखियाँ दुखियानि कुबानि परी, न कहूँ लगैं कौन घरी सुलगी। मति दौरि थकी, न लहै ठिक ठौर, अमोही के मोह मिठास ठगी।
Ritisidth Kavy Dhara रीतिसिद्ध काव्य-धारा
Ans. रीतिकाल में ऐसे कवि भी हुए जिन्होंने रीति-काव्य की परिपाटी को अपनाते हुए भी लक्षण-ग्रंथ नहीं रचे, अपितु स्वतंत्र तथा मौलिक काव्य रचनाओं के द्वारा अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इस धारा के अत्यंत प्रसिद्ध कवि बिहारी हैं।
इनकी 'सतसई' मुक्तकों का सागर है और इसमें संकलित हर दोहे का स्वतंत्र विषय है। इन दोहों की कसावट, थोड़े से शब्दों में बड़ी बात कह देने की कला देखते ही बनती है। बिहारी-सतसई के संदर्भ में एक उक्ति काफी प्रचलित है__सतसैया के दोहरे, ज्यों नायक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करें गंभीर।।
Bihari ki Kavy Kla बिहारी (1595-1663) की काव्य-कला
Ans. बिहारी का जन्म ग्वालियर में हुआ था। अपने पिता के गुरू नरहरिदास के यहाँ बिहारी ने संस्कृत, प्राकृत के काव्यग्रंथों का अध्ययन किया था। इन्होंने फारसी काव्य का अभ्यास भी किया था। ये शाहजहाँ के कृपापात्र थे तथा जोधपुर, बूंदी आदि अनेक रिसासतों से भी इन्हें वृत्ति मिलती थी।
मुक्तक परंपरा में बिहारी बेजोड़ हैं। इनके यश का आधार इनका एकमात्र ग्रंथ सतसई है, सतसई दोहों का संग्रह है, जिसमें बिहारी ने अलंकार, रस, भाव, नायिक-भेद, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति, गुण आदि का ध्यान रखा है। सतसई में आलंकारिक चमत्कार और भाव सौंदर्य दोनों ही हैं तथा इसे मुक्तक काव्य की प्रतिनिधि रचना के रूप में महत्व प्राप्त है। सतसई के द्वारा इन्होंने जो ख्याति अर्जित की वह हिंदी का अन्य कवि नहीं कर सका। इनकी यह ख्याति निराधार नहीं है।
Ritimukt Kavy Dhara, Ritisidth Kavy Dhara, Bihari ki Kavy Kla
आचार्य शुक्ल ने बिहारी के दोहों को 'रस के छोटे-छोटे छींटे' कहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बिहारी का काव्य मुक्तक काव्य की कसौटी पर खरा उतरता है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी अनगिनत टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं।
- Ghananand👉 घनानंद (1658-1739)
- Jay Jay Bhairavi ........... Bhayawani
बिहारी ने संयोग श्रृंगार का वर्णन प्रमुखता से किया है। इसके अतिरिक्त इनकी सतसई में भक्ति, नीति, प्रशस्ति आदि विषयक दोहे भी हैं। _ बिहारी की काव्यभाषा शुद्ध ब्रजभाषा है। इनकी भाषा व्याकरण से अनुशासित है और विषय के अनुरूप चुस्त है।
भाषा के व्यवस्थित प्रयोग और परिमार्जित शैली के कारण उसमें साहित्यिक दोष ढूँढ निकालना मुश्किल है। इनके दोहों में प्रयुक्त अलंकार सौंदर्य का दूना बढ़ा देते हैं। भाषा से इन्होंने चमत्कार उत्पन्न किया है लेकिन अनुभूति की उपेक्षा कर के नहीं। दोनों का संतुलन ही बिहारी को अन्य कवियों से अलग सिद्ध करता है।
