Khusro, Vidyapati Kavi Parichay | खुसरो, विद्यापति कवि परिचय. Khusro started his work around 1340. He saw the era of many rulers from Balban to Alauddin, Qutubuddin, Mubarak Shah, etc. He died in No. 1381. He was a very good poet of Persian. His retort and puzzles in simple language are very famous.
Vidyapati is also a poet of Apabhramsa. But due to which it is called 'Kokil Maithil', it is their 'phraseology' which is in the 'Maithili' prevalent in that area. The posts of Vidyapati are often of Shringar, with the hero and heroine Krishna and Radha.
Khusro Kavi Parichay खुसरो कवि परिचय
Ans. खुसरो ने अपनी रचना सं० 1340 के आसपास आरंभ की। इन्होंने बलबन से लेकर अलाउद्दीन, कुतुबुद्दीन, मुबारक शाह आदि कई शासकों का जमाना देखा था। इनकी मृत्यु सं० 1381 में हुई। ये फारसी के बहुत अच्छे कवि थे। सरल भाषा में इनकी मुकरियाँ और पहेलियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं।
इनकी बोली पर दिल्ली तथा मेरठ का तत्कालीन भाषा का प्रभाव था। खड़ीबोली के पुराने रूप में दर्शन अमीर खुसरो की पहेलियों तथा मुकरियों में किए जा सकते हैं। इस भाषा में अरबी तथा फारसी शब्दों का प्रयोग हिंदी क्रियाओं के साथ किया गया है। खुसरों की निम्नलिखित पहेली तो आज भी लोगों की जिहवा पर है
Sandesh Rasak Ki Rachana Kaisi thi | 👉संदेश रासक की रचना कैसी थी.
एक थाल मोती भरा, सबके सिर पर औंधा धरा। चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।।
(आकाश) उनकी भाषा का एक और नमूना देखें -
'बाला था जब सबको भाया, बढ़ा हुआ कुछ काम न आया। खुसरो कह दिया उसका नाँव, अर्थ करो नहीं छोडो गाँव।। (दिया, दीपक)
Vidyapati Kavi Parichay विद्यापति कवि परिचय
Ans. विद्यापति अपभ्रंश के भी कवि हैं। लेकिन जिसके कारण ये कोकिल मैथिल कहलाए वह इनकी 'पदावली' है जो उस क्षेत्र में प्रचलित 'मैथिली' में है। विद्यापति के पद प्रायः श्रृंगार के ही हैं जिसमें नायक और नायिका कृष्ण और राधा हैं। विद्यापति सं० 1460 में तिरहर के राजा शिवसिंह के यहाँ वर्तमान थे।
उनके काव्य में वैष्णव धर्म की मर्यादा और शैव मत का तादात्म्य-भाव दोनों एक साथ मिलते हैं। काम-भाव और शरीर के सौंदर्य के अनेक चित्र उनके काव्य में मिलते हैं। हालांकि अपने समय की परंपरा के अनुसार विद्यापति ने अपने आश्रयदाता राजाओं को केन्द्र में रखकर 'कीर्तिलता' और कीर्तिपताका' ग्रंथों की भी रचना की। 'कीर्तिलता' अवहट्ठ भाषा रूप में उपलब्ध है।
-मोटे हिसाब से वीरगाथा काल महाराज हम्मीर के काल तक ही समझना चाहिए। वीर गाथाएँ इसके बाद भी लिखी जाती रही होंगी। लेकिन इसके बाद हिंदी साहित्य की मुख्यधारा भक्तिकाल में प्रवेश कर जाती है।
