Kabir Ya Bijak, Raidas Ki Bhakti, Tulsidas Aur Rachanaen. The instinct of devotion within Kabir had developed in childhood. It is famous that Ramananda was his guru. Kabir was not educated. The knowledge that he gained from self-reflection and public inspection, he expressed fearlessly in his letters and posts.
Like Kabir, Raidas too has more emphasis on devotion than poetry and art. There is a mild opposition to social inequality in his poems. He has expressed his dissatisfaction with the inequality of the varna system.
Kbir Ya Bijak, Raidas Ki bhakti, Tulsidas Aur Rachanaen
Tulsidas is a poet of the practice of Lokmangal. He is also called the poet of ordination. The sentiment of Tulsidas is very broad in religious, cultural, and social terms. Because of his deep insight and extensive life experience in human nature and life, he was able to inaugurate various aspects of folklife in Ramcharitmanas.
Kbir Ya Bijak | कबीर (1399-1518) या 'बीजक'
Ans. वाल्यावस्था में ही कबीर के भीतर भक्ति की प्रवृत्ति पनप चुकी थी। प्रसिद्ध है कि रामानंद उनके गुरू थे। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। आत्म-चिंतन एवं लोकनिरीक्षण से जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया, उसे ही निर्भयतापूर्वक अपनी साखियों और पदों में अभिव्यक्त किया। वर्णाश्रम धर्म में प्रचलित कुरीतियों और लोक में प्रचलित अपधर्म को कबीर ने निशाने पर लिया।
वे ऐसे कर्मयोगी थे जो अंधविश्वासों की खाई पाटने के लिए अपना घर जलाने को सदा तैयार रहते थे। उनकी कथनी और करनी में जबरदस्त एकता थी। ___ उनकी कविता में छंद, अलंकार, शब्द-शक्ति आदि गौण हैं और लोकमंगल की चिंता प्रधान है। इनकी वाणी का संग्रह 'बीजक' नाम से है। बीजक के तीन भाग हैं-सबद में गेयपद हैं, रमैनी चौपाई तथा साखी दोहा छंद में हैं।
सिखों के 'गुरू ग्रंथ साहब' में भी कबीर के नाम से 'पद' तथा 'सलोकु' संकलित हैं। कबीर की अभिव्यंजना शैली बहुत सशक्त थी। उनकी भाषा अनेक बोलियों का मिश्रण है। इस मिश्रित भाषा को सधुक्कड़ी या पंचमेल कहा गया। कबीर के काव्य में प्रतीक योजना का भी सुंदर निर्वाह हुआ है।
Raidas Ki bhakti | रैदास (1388-1518) की भक्ति
Ans. कबीर की भाँति रैदास का बल भी काव्य और कलापक्ष की अपेक्षा भक्ति पर अधिक रहा है। उनकी कविताओं में सामाजिक विषमता के प्रति मृदु विरोध है। उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था की असमानता के प्रति असंतोष प्रकट किया है। रैदास के पद गुरूग्रंथ साहब में संकलित हैं
और कुछ फुटकल पद 'सतबानी' में। उनकी भक्ति का स्वरूप निर्गुण है, लेकिन कबीर जैसी आक्रामकता उनमें नहीं है। वे अपनी कविता में अत्यंत विनम्र और निरीह हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा आदि बाह्य विधानों का विरोध कर आभ्यंतरिक साधना पर बल दिया है। अपने भावों की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने जिस भाषा का प्रयोग किया
है, वह सरल व्यावहारिक ब्रजभाषा है जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। उपमा तथा रूपक अलंकार रैदास को अधिक प्रिय है।
___ संत रैदास रामानंद के बारह शिष्यों में एक हैं। अनन्यता, भगवत प्रेम, दैन्य, आत्मनिवेदन और सरलह्रदयता इनकी रचनाओं की विशेषता है। एक उदाहरण देखें
अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी। प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी
प्रभु जी तुम धन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा
तुलसीदास (1532-1623) या तुलसी की रचनाएँ
Ans. तुलसीदास लोकमंगल की साधना के कवि हैं। उन्हें समन्वय का कवि भी कहा जाता है। तुलसीदास का भावजगत धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत व्यापक है। मानव प्रकृति और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतर्दृष्टि और व्यापक जीवनानुभव के कारण ही वे रामचरितमानस में लोक जीवन के विभिन्न पक्षों का
उद्घाटन कर सके। मानस में उनके हृदय की विशालता, भाव प्रसार की शक्ति और मर्मस्पर्शी स्थलों की पहचान की क्षमता पूरे उत्कर्ष के साथ व्यक्त हुई है। तुलसी को मानस में जिन प्रसंगों की अभिव्यक्ति का अवसर नहीं मिला उनको उन्होंने कवितावली, गीतावली आदि में व्यक्त किया है।
Ramcharitmanas, Kavitavali, Gitavali | 👉रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली.
विनय पत्रिका में विनय और आत्म-निवेदन के पद हैं। इस प्रकार तुलसी के काव्य में विश्वबोध और आत्मबोध का अद्वितीय समन्वय हुआ है। - तुलसीदास की रचनाओं में भाव, विचार, काव्यरूप, छंद विवेचन और भाषा की विविधता तथा समृद्धि मिलती है। रामचरितमानस हिंदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। इसकी रचना मुख्यत: दोहा और चौपाई छंद में हुई है। भाषा उसकी अवधी है।
गीतावली कृष्ण गीतावली तथा विनय पत्रिका पद शैली की रचनाएँ हैं तो दोहावली स्फुट दोहों व संकलन। कवितावली कवित्त और सवैया छंद में रचित उत्कृष्ट रचना है।
