Ghananand घनानंद (1658-1739). Ghanananda has reiterated the relation between Adi and Sujan in his poetry from beginning to end. It is said that he loved a dancer named Sujan. This Janashruti appears to be true when in his compositions he appears to be riddled with Sujan's name and longing for it. The major texts of Ghanananda are 'Sujan Sagar', 'Virah Leela', 'Rasakeliballi', and 'Kripakand'.
Ghananand घनानंद (1658-1739)
घनानंद ने अपने काव्य में आदि से अंत तक अपने और सुजान के संबंध को ही दुहराया है। कहा जाता है सुजान नामक नर्तकी से इन्हें प्रेम था। यह जनश्रुति तब सत्य प्रतीत होती है जब अपनी रचनाओं में वे सुजान का नाम रटते और उसके लिए तड़पते दिखाई देते हैं। घनानंद के प्रमुख ग्रंथ हैं- 'सुजान सागर', 'विरह लीला', 'रसकेलिबल्ली', और 'कृपाकांड'।
रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रायः सभी गुण घनानंद की काव्य शैली में मिलते हैं। जैसेभावात्मकता, वक्रता, लाक्षणिकता, भावों की वैयक्तिकता, रहस्यात्मकता, मार्मिकता, स्वच्छंदता आदि। अपने जीवन और कविता का अर्थ बताते हुए घनानंद कहते हैं
यो घन आनंद छावत भावत जान सजीवन और ते आवत।
लोग हैं लागि कवित्त बनावत मोहि तो मेरो कवित्त बनावत।। तात्पर्य यह कि घनानंद का काव्य उनके जीवन की सच्ची अनुभूतियों का सहज-स्वच्छंद प्रकाशन है। घनानंद की भाषा प्रांजल ब्रजभाषा का उत्कृष्ट उदाहरण है। मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग द्वारा कवि ने उसे जीवन के और अधिक निकट लाने का सफल प्रयास किया है।
