Bisaldev Raso, Prithvi Raj Raso | बीसलदेव रासो पृथ्वीराज रासो. The poet named Narpati Nalha was a contemporary of Bisal Dev and possibly his court poet. It has written a small book titled 'Bisaldeo Raso'. Poetry in the name of 'Hammer Raso', 'Parmal Raso
Hindi is the first epic and its author Chandbardai is the first Hindi poet. Prithviraj Raso is a very large treatise of two and a half thousand pages containing 96 chapters. Almost all the verses used in ancient times have been used in it.
Bisaldev Raso बीसलदेव रासो
Ans. नरपति नाल्ह नामक कवि बीसल देव का समकालीन था और संभवतः उसका दरबारी कवि था। इसने 'बीसलदेव रासो' नाम का एक छोटा-सा ग्रंथ लिखा है। शाईगधर कृत 'हम्मीर रासो', जगनिक रचित 'परमाल रासो', उत्तर प्रदेश में 'आल्हखंड' के नाम से काव्य प्रचलित है।
धीरे-धीरे 'आल्हा' लोकगीत की एक शैली बन गया और आधुनिक विषयों पर भी 'अल्हा' लिखे जाने लगे। इसी काव्य की ये पंक्तियाँ हैं, जो लोकजिह्वा पर चढ़ गई हैं
'बारह बरिस सौ कूकर जीवै, अरू तेरह लौ जिये सयार। बरस अठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन को धिक्कार।
'बारह बरिस सौ कूकर जीवै, अरू तेरह लौ जिये सयार। बरस अठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन को धिक्कार।
Prithvi Raj Raso पृथ्वीराज रासो
हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है और इसके रचयिता चंदबरदाई हिंदी के प्रथम महाकवि हैं। पृथ्वीराज रासो ढाई हजार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है जिसमें 96 अध्याय हैं। इसमें प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों का प्रयोग हुआ है। पृथ्वीराज रासो पूरा चंद का लिखा हुआ नहीं है। इसका उत्तरार्ध उनके पुत्र जल्हण ने पूरा किया। इसका संकेत रासो में ही मिलता है
Khusro, Vidyapati Kavi Parichay |👉 खुसरो, विद्यापति कवि परिचय.
'पुस्तक जल्हण हाथ दै चलि गज्जन नृप काज।
अन्य रचनाएँ- अब तक हम हिंदी-साहित्य के आदि काव्य पर बहुत बातें कर चुके हैं। हमने शुरू में ही कहा था कि असल में रासो ग्रंथों, नाथों और जैनियों की रचनाओं में बहुत कुछ प्राकृत का अंश बच रहा था। वे शुद्ध हिंदी की कोटि में नहीं आतीं। शुद्ध हिंदी में रचनाएँ परवर्ती काल में ही हो पाई। और उस समय इसके दो प्रतिनिधि कवि थे- पश्चिम में अमीर-खुसरो और सुदूर पूरब में विद्यापति।
