Ashtchap Ke Kavi अष्टछाप के कवि. After the demise of Mahaprabhu Vallabhacharya, his son Gosai Vitthalnath established 'Ashtachap' with eight devotees of Pushtimarg, the first four of whom are the remainder of Vallabhacharya within the purview of his discipleship. These eight devotees are - Surdas, Kumbhandas, Paramanandadas, Krishnadas, Kshitaswami, Govindaswamy
Ashtchap Ke Kavi अष्टछाप के कवि
Ans. महाप्रभु वल्लभाचार्य के निधन के पश्चात उनके पुत्र गोसाई विट्ठलनाथ ने पुष्टिमार्ग के आठ भक्तों को लेकर 'अष्टछाप' की स्थापना की, जिनमें प्रथम चार वल्लभाचार्य के शेष उनके शिष्यत्व के दायरे के हैं। ये आठ भक्त हैं- सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, क्षीतस्वामी, गोविन्दस्वामी, चतुर्भुजदास और नन्ददास। सूरदास तो 'अष्टछाप के जहाज' थे ही, उनके उपरान्त ख्याति नंददास को मिली। अष्टछाप के कवि कृष्ण-भक्त ही हैं। अष्टछाप के
- Dard Divani Meera👉 Meera
कवियों ने वल्लभसंप्रदाय की भावना को स्वीकार कर कृष्ण के बालरूप का विस्तार से वर्णन किया है। कवियों ने कृष्ण को अपना आराध्य देव माना है और कृष्ण की ब्रजलीलाओं का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण की लीलाओं के साथ ब्रज प्रदेश का लोक जीवन, उसकी प्रकृति सब उसमें समाहित है, अपने पूरेपन में, अपने समूचे माधुर्य के साथ।
श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं तथा किशोरवय की रास आदि लीलाओं का मोहक, बारीक, भव्य और मनोहर संसार रचा है। श्रीकृष्ण जो इन लीलाओं के नायक हैं-केंद्रस्थ हैं तथा नंद, यशोदा, राधा, गोप-गोपिकाएँ सब इस लीला-परिधि में-केन्द्रस्थ श्रीकृष्ण के इर्द-गिर्द हैं। अष्टछाप के कवियों ने साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी बहाई।
