Chhath puja-about Chhath Puja-Chhath puja dates-Chhath puja kab hai

Chhath puja-about Chhath Puja-Chhath puja dates-Chhath puja kab hai. मेरे प्यारे दोस्तों। छठ पूजा के इस पोस्ट में मैं आपको बताऊंगा। छठ पूजा की हर छोटी और बड़ी बातें। जो आप छठ पूजा के बारे में जानते हैं। या जानना चाहते हैं। छठ पूजा क्यों मनाया जाता है।

छठ पूजा कैसे मनाया जाता है। और छठ पूजा कि क्या समाज में आस्था से जुड़ी बातें हैं। छठ पूजा की शुरुआत कहां से हुई। छठ पूजा का नामकरण कैसे हुआ। छठ पूजा सूर्य से जुड़ा हुआ है। छठ पूजा में सूर्य की उपासना करने की क्या वजह है। पौराणिक कथाएं क्या है। छठ पूजा की लोक कथाएं क्या है। 

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Happy chhath puja

Chhath puja dates Chhath puja kab hai

    छठ पूजा की सामाजिक संस्कृति और महत्व। कुछ लोकप्रिय गीतों के बारे में भी मैं आपको बताऊंगा इस पोस्ट में। इस पोस्ट में मैं आपको छठ पूजा के बहुत सारे इमेजेस दूँगा। जिसपे छठ पूजा की शुभकामनाएं लिखी होंगी। आपके समक्ष प्रस्तुत करुंगा। प्रत्येक वर्ष छठ पूजा कब-कब होती है, उस पर भी हम चर्चा करेंगे। इस पोस्ट में छठ पूजा के सुंदर और बहुत ही लुभावने इमेजेस। जो कि आपको देखकर बहुत ही अच्छा लगेगा। मैंने बहुत ही मेहनत से इन्हें एकत्रित कर बनाया है। और इनमें टेक्स्ट के रूप में कुछ शायरियां, स्टेटस, लिखी होंगी।

    Chhath puja kab hai

    छठ पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाने वाली एक हिंदू  पर्व है। छठ पूजा षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। इसलिए छठ पूजा को षष्टि पूजा भी कहा जाता है। सूर्य की उपासना का यह अद्भुत और आस्तिक पूजा का शुरुआत बिहार से किया गया। और यह पर्व बिहार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और लोक आस्था का पर्व है।

    और इस पर्व को मुख्य रूप से बिहार में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। छठ पूजा बिहार के लगभग हर घरों में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। और साथ ही साथ झारखंड, नेपाल आदि बहुत से राज्यों में छठ पूजा की महत्ता को आप देख सकते हैं। छठ पूजा चार दिनों का पर्व होता है।

    Chhath puja

    इस पर्व में बहुत ही नियम के साथ जो व्रत करने वाली होती हैं। वह अपना हर एक कदम बहुत ही नियम और धर्म के साथ उठाती हैं। अपने सभी कार्य को नियम पूर्वक करती हैं। क्योंकि इस लोक आस्तिक महापर्व छठ पूजा में पंडित जी नहीं आते हैं। इसलिए सभी छठ पूजा करने वाली महिलाएं एवं पुरुष नियम धर्म का पालन करते हैं।
     
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    Chhath Puja 2021

    वैदिक काल से चला आ रहा छठ पूजा का यह पर्व। बिहार के साथ-साथ पूरे भारत वर्ष में अब मनाया जाने लगा है। हिंदू भाइयों के साथ-साथ बहुत सी जगहों पर मुसलमान भाई भी इस पर्व को मनाते हैं। छठ पूजा में आस्था का जो अद्भुत नज़ारा देखने को मिलेगा। वह किसी और पर्व  में देखने को नहीं मिलता है।

    About Chhath Puja

    छठ पूजा सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित है। क्योंकि हमारी प्रकृति पर जो जीवन धारा चलती हैं। इस जीवन धारा को सुचारु रूप से चलाने के लिए। सबों को सुखी संपन्न रखने के लिए। छठ पूजा का यह व्रत सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु और उनकी बहन छठी मैया को समर्पित किया जाता है। 
    उनको इस व्रत के जरिए शुभकामनाएं दी जाती हैं। उनकी आराधना की जाती है कि हे छठी मैया आप हमें इसी प्रकार से।
     
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    Jai Chhathi Maiya 

    हमारी प्रकृति को हमारी इस विश्व को ऐसे ही सुचारु रुप से चलाएँ। और जीवन की जो रेखा है पृथ्वी पर उसे यूं ही बने रहने दें।  छठ पूजा बड़ा ही नेमटेम से करने वाला पर्व हैं। इसमें जो भी लोग छठ पूजा का व्रत करते हैं। उन्हें बहुत ही ज्यादा नियमों का पालन करना होता है। छठ पूजा के नियम बहुत ही कठोर है। आप सोच सकते हैं जब जाड़े का समय होता है।

    Chhathi Maiya Ki Jay Ho

    आप घर से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। रजाई से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। उस समय उस परिस्थिति को आप महसूस कर सकते हैं। तो उस ठंड के मौसम में छठ पूजा का त्यौहार मनाया जाता है। और इस त्यौहार में जो लोग छठ पूजा करते हैं। उनको पानी में खड़ा होना होता है। और सूर्य को अर्घ्य देना होता है। 

    इसी तरह की और बातें हम आगे जानेंगे विस्तार पूर्वक। छठ पूजा मनाया कैसे जाता है। परंतु मैं यहां आपको बता दूं। कुछ मुख्य बातें जिसमें की छठ व्रत को आप समझ सकें। और विस्तार से उन्हीं बातों पर भी हम चर्चा करेंगे। छठ पूजा को बूढ़े, नौजवान, स्त्री-पुरुष, सभी कर सकते हैं। पर इसमें जो चार दिनों का बहुत ही कठिन परीक्षा होता है। आपको पानी तक नहीं पीना होता है। और भी बहुत ही कठोर नियम है।

    Chhath puja dates (छठ पूजा की शुरुआत)

    मान्यता है कि। छठ पूजा की शुरुआत देव माता अदिति ने किया था। देव और असुर की जब लड़ाई हो रही थी। तब असुरों के हाथ देवता हार गए थे। तब देव माता ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए। देवों के देव सूर्य देव की मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। जिसके उपरांत छठी मैया प्रसन्न होकर। देव माता अदिति को पुत्र होने का वरदान देते हैं। जिससे अदिति को पुत्र की प्राप्ति होती है। और वह पुत्र त्रिदेव रूप आदित्य भगवान। जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजई दिलाया। कहा जाता है कि उसी वक्त से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हुआ। और इसका चलन वहीं से प्रारंभ हुआ

    How was Chhath christened…(छठ का नामकरण कैसे हुआ)

    पूरे भारतवर्ष में जहां भी छठ पूजा मनाया जाता है। वहां छठ पूजा साल में दो बार मनाया जाता है। पहला चैत्र के महीने में और दूसरा कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि, और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है। षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी हम जानते हैं। और नवरात्रि के दिन में हम षष्टि माता की पूजा आराधना करते हैं। षष्ठी माता की पूजा घर परिवार के सदस्यों द्वारा सभी


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    सदस्यों को सुरक्षित और स्वस्थ रखने के लिए की जाती है। माता षष्टि की पूजा सूर्य भगवान और मां गंगा की पूजा। देश और समाज द्वारा की जाने वाली बहुत बड़ी पूजा है। छठ पूजा गंगा नदी तालाब जैसी जगहों पर करना अनिवार्य है। यही कारण है कि छठ पूजा के लिए सभी नदी, तालाबों की सफाई जाती है। और नदी तालाब को सजाया जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य में गंगा मैया या नदी तालाबों की मुख्य स्थान माना जाती है।

    Nahay Khay छठ पूजा का पहला दिन (नहाय खाय कब है)

    छठ पूजा जो का पहला दिन जो होता है। उसमें सभी लोग जो छठ पूजा का उपवास करते हैं। उनको अनिवार्य रूप से कद्दू भात खाना होता है। और उसके साथ-साथ घर के जो सदस्य होते हैं। सभी सदस्य दद्दू भात खाते हैं। अब मैं आपको विस्तार पूर्वक बताता हूं। कि यह कद्दू भात किस तरह से बनाया जाता है। और खाया जाता है।

    यह बहुत ही इंटरेस्टिंग है। और इसमें बरा मजा आता है। कद्दू की भुजिया, कद्दू का सब्जी और कद्दू का पकोड़ा, यह सभी बनाया जाता है। पहले दिन कद्दू भात इसलिए नाम रखा गया। क्योंकि कि इस दिन कद्दू खाना बहुत ही अनिवार्य होता है। और एक मुख्य बात है की जो भी कद्दू भात और दाल बनता है। वह सेंधा नमक में बनाई जाती है।

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    शुद्ध गाय का घी उपयोग में लिया जाता है। और राहड़ के दाल से दाल बनाई जाती है। और पापड़। अगर मन हो तो आप पापड़ खा सकते हैं। पर जिनको इतना कुछ संभव ना हो पाए। वह कम से कम कद्दू की सब्जी और अरवा चावल जरूर खाते हैं। यह अनिवार्य है।

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    छठ पूजा 

    मैं खुद की बताऊं तो मुझे बड़ा मजा आता है इस दिन। क्योंकि इस दिन सब कुछ कद्दू का ही बनता है। जैसे कि कद्दू का पकोड़ा हो गया, कद्दू की सब्जी हो गई, वहीं भुजिया जिसको बोलते हैं। कद्दू को भूज के बनाया जाता है। और राहर का दाल और अरवा चावल। साल में एक बार इस छठ पूजा में मैं बड़े ही चाव से खाता हूं। ( बाकि दिन भी खाता हूँ पर छठ के दिन की बात ही अलग है। )क्योंकि और सभी दिन अरवा चावल खाने में अच्छा नहीं लगता है। लेकिन यह बहुत ही मजेदार वक्त होता है। जब हमारे सामने इन सभी चीजों से भरी हुई थाली आती है।

    Kharna / Lohanda छठ पूजा का दूसरा दिन (खरना/लोहंडा)

    तो छठ पूजा का जो दूसरा दिन होता है। इस दिन को खरना बोला जाता है। इस दिन रात में 8:00 से 9:00 के बीच खीर पूरी चढ़ाने की परंपरा है। घर को पूरी तरह से बंद करके (छठ परवर्तिन) जो छठ पूजा करती/करते हैं। वह खीर और पूरी चढ़ाते हैं। (जहाँ तक संभव हो) खीर पूरी के साथ मुरई, सेब संतरा, आदि फल भी चढ़ाते हैं। जितने भी फल उस मौसम में फल मिलती हैं। आप छठी मैया के पूजा में उपयोग में ले सकते हैं।

    खरना/लोहंडा

    परंतु मुख्य रूप से खीर-पूरी और वह भी खीर जो बनती है। वह गुड़ में बनाई जानी चाहिए। ना कि चीनी में। केले फल आदि चढ़ाई जाती हैं। और सन्ति मन से पूजा संपन्न किया जाता है। खरना का। छठ पूजा की आराधना कर वह प्रसाद सभी को घर में बांटा जाता है। और आस पड़ोस के लोगों को भी खाने के लिए बुलाया जाता है। उस प्रसाद को लोग श्रद्धा पूर्वक खाते हैं।

    छठ पूजा का तीसरा दिन (संध्या अर्घ्य)

    छठ पूजा का तीसरा दिन, यानी छठ पूजा, जिसका कि हमें बेसब्री से इंतजार होता है। हम छठ पूजा के घाट पर जाते हैं। जिस किसी नदी के किनारे या पोखर, तालाब के किनारे हमारा छठ पूजा का घाट बनाया जाता है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति जो छठ पूजा करते हैं। उनका छठ पूजा का घाट अलग-अलग स्थानों पर बनता है।

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    जैसे कि पटना में बहुत से लोग छठ करते हैं। और पटना के घाट पर इस तरह की संगीत भी आपको मिलेंगे। ऐसी बहुत सी संगीत प्रचलित हैं जिसमें पटना के घाट का जिक्र है। इसी तरह अपने गांव और शहर में अपने अपने घाटों पर लोग जाते हैं। तीसरे दिन डाला सूप में फल और थकवा सजा कर ले जाया जाता है।

    Sandhya Argh 

    घाटों पर जहां पर भी उनका घाट होता है वहां। और इस दिन सूर्य देव को अरघ दिया जाता है। शाम का संध्या अर्घ्य डूबते हुए सूर्य को दिया जाता है। डूबता सूर्य को पूजने वाला यह पहला पर्व है। और इस पर्व से हमें सीख मिलती है। कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में हो। चाहे उसकी जीवन की रेखा निचे जा रही हो डूब रही हो। या ऊपर जा रही हो। हमें उनका साथ देना चाहिए। हमें उसेसे मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। बिहार का महापर्व छठ पूजा जिसमें उगते हुए सूर्य और डूबते हुए सूर्य दोनों को अर्घ्य दिया जाता है। जय बिहार

    छठ पूजा का चौथा दिन (उषा अर्घ्य)

    ऊषा अर्घ्य से ही सम्पन्न होता है छठ का महापर्व। तो छठ पूजा का चौथा दिन बहुत ही कष्ट दाई होता है। उन लोगों के लिए जो छठ का व्रत करते हैं। क्योंकि कार्तिक माह का जो छठ पूजा होता है। उसमें कितनी ठंड होती है, वह आप खुद समझ सकते हैं। उस ठंड में छठ का चौथा दिन मनाया जाता है।

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    और उस ठंड में हर घाट का पानी कितना ठंडा होता है, आप समझ सकते हैं। उस ठंडे पानी में जो व्रत करती हैं, वह परवर्तिन कड़ी होती हैं। और सूर्य की तरफ देखते हुए, जिधर से सूर्य उगने वाले होते हैं। (पूर्व दिशा में) उधर देखते हुए हाथों में अगरबत्ती और पान सुपारी आदि लेकर सूर्य को एकटक देखते रहते हैं।

    Usha Arghya 

    उनके मन में वे सभी बातें होती हैं। जो वह सूर्यदेव से बोलना चाहते हैं, मांगना चाहते हैं। तो ऐसे वक्त में इस परिस्थिति में। जब वह खुद को कष्ट दे रहे होते हैं। तो सूर्य देवता से अपनी मन की बातें करते हैं। घण्टो परवर्तिन पानी में खड़े होकर। सूर्यदेव से अपनी सारि कमियां और अपनी जिंदगी सुखमय जीने की।कामना कराती हैं। इसके साथ ही वह अपने परिवार, अपने बच्चों, के लिए खुशियां मांगती हैं। और मंगल कामना करती है। उसके परिवार के सभी सदस्य सुखी संपन्न रहें।

    About Chhath Puja

    तथा जिन्हे पुत्र नहीं होता वो छठी मैया से पुत्र की इच्छा करती है। और जब सूर्यदेव प्रकट होते हैं, तो लोगों में भी उत्साह काफी ज्यादा होता है। और सूर्य देव के उगने के पूर्व लोग घंटों खड़े रहते हैं। घाट पर बैठे उनके परिवार के लोग। और जहाँ सूप रखी होती हैं उस पर मोमबत्तियां, अगरबत्ती आदि चलाते हैं। बाहर बच्चे पटाखे फोड़ते हैं। और बड़े लोग खड़े होकर छठ पूजा का लुफ्त उठाते हैं। बच्चों को बड़ा ही अच्छा लगता है, जब छठ पूजा होता है। उसे पटाखे फोड़ने की आजादी मिलती है।

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    और ऐसे स्थानों पर उनको जाने को मिलता है। जहां आसपास (बहुत ही कम देखा गया है कि आसपास घर हो ) बच्चे मन मुताबिक पटाखे फोड़ते हैं। और दोस्तों के साथ इधर-उधर घूमते हैं। (पर खाट पर ही रहते हैं) इसी के साथ छठ पूजा का चौथा दिन समाप्त होता है। सभी लोग जब सूर्यदेव प्रकट होते हैं। तो सूर्य को ऊषा अर्घ्य देते हैं।

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    जिसमें दूध का उपयोग किया जाता है, गाय के दूध से सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। और यदि दूध ना मिले तो लोग पानी से भी सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं। जो लोग व्रत करते हैं। जिनके मुख में खरना के बाद एक बूंद पानी भी नहीं गया होता है। सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।

    उसके बाद उनके परिवार के भी लोग और आसपास मौजूद सभी लोग सूर्यदेव को अर्घ्य देते है। और ऊषा अर्घ्य से सम्पन्न होता है छठ पूजा का महापर्व। और अपने अपने घर आते हैं। बहुत ही खुशी का माहौल होता है, इस दिन सभी लोग एक दूसरे को छठ पूजा का प्रसाद वितरण करते हैं। और छठ पूजा का ठेकवा इनके क्या कहने। छठ के गानों में इनकी महत्ता सुनते ही बनता है। और आप जब उस संगीत को सुनेंगे तो छठ पूजा की क्या महत्ता है।

    Chhath Puja Ke Niyam (छठ पूजा के कुछ नियम)

    छठ पूजा का नियम एक कठिन तपस्या की तरह होता है। ज्यादातर छठ पूजा महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। छठ पूजा का व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। 4 दिनों के छठ पूजा में जो व्रति होती है। उनको लगातार उपवास करना होता है। खाना-पीना के साथ ही उनको सुखमय सैया का भी त्याग करना पड़ता है। जो लोग गद्देदार वस्तुओं पर सोते हैं। उनको उनका त्याग करना पड़ता है। व्रत के लिए बनाया गया व्रति का कमरा पूरी तरह से नया होता है। या उसे पूरी तरह से धोकर नए जैसा साफ सुथरा किया जाता है। और उस कमरे के फर्श पर वह व्रति सोती है

    छठ पूजा के कुछ नियम

    उनको सिर्फ एक कंबल या एक चादर के सहारे सोना होता है। और आप समझ सकते हैं। कि उन मौसमों में कितनी ठंड होती है, छठ पूजा में जो लोग उपवास करती है, या करता है। उनको पूरी तरह से नई साड़ी और धोती पहनना होता है। जो पुरुष होते हैं, वह धोती पहनते हैं, और महिलाएं साड़ी पहनती हैं। और उनके घर के सभी लोग नए कपड़े पहनते हैं। किसी परिवार में यदि छठ पूजा प्रारंभ हो गया हो, किसी ने छठ का व्रत उठा लिया हो। तो उनको पीढ़ी दर पीढ़ी यह छठ का व्रत करना होता है। तब तक छठ का व्रत करना होता है, जब तक उनकी जिंदगी और वह छठ व्रत को कर पाएं।

    Happy chhath puja

    यदि किसी महिला ने छठ का व्रत उठाया और वह छठ कर रही हैं। तो उनको तब तक छठ करना होगा, जब तक उनकी फैमिली में कोई नई बहू या महिला उनसे वह व्रत ले नहीं देती। जो कि एक समय होता है, जब महिला बूढी हो जाती हैं। और वह छठ व्रत का उपवास नहीं कर पाती है। तब उनकी बहू उससे छठ का व्रत लेती हैं। कहा जाता है कि वह जो बरसों से कर रही होती हैं वह अपनी बहू को छठ का व्रत सौंपती है कि उनकी बहू अब से, आगे से इस छठ व्रत की परंपरा उनके परिवार में आगे बढ़ाएगी।

    छठ का व्रत किसी भी परिवार में ना मनाने का सिर्फ एक कारण होता है। कि उनके परिवार में या उनके खानदान में किसी की मृत्यु हो जाती है। तभी उस वर्ष उसके यहां छठ पूजा का व्रत नहीं मनाया जाता है। इसके अलावा यदि किसी के परिवार में जो हिंदू धर्म की मान्यता है। मृत्यु के बाद छुआछूत की वह ना हो तो उस फैमिली में यदि छठ का व्रत एक बार उठा लिया गया है। तो उनको वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी करना ही होगा।

    Chhath festival

    ऐसी मान्यताएं हैं, कि जिन महिलाओं को पुत्र की प्राप्ति नहीं होती हैं। ऐसी कथाएं भी बहुत सी है। पौराणिक कथाएं जिसमें की महिलाएं अपने पुत्र की खातिर छठ का व्रत करती हैं। और सूर्यदेव को कहती, हैं कि उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हो। और महिलाएं अपने पुत्र की मंगल कामना के लिए, अपने पूरे परिवार की मंगल कामना के लिए। छठ का व्रत करती हैं।

    उसी प्रकार पुरुष भी जब छठ व्रत करते हैं। तो वह भी अपने मन वांछित फल के लिए सूर्य देव का पर्व महा आस्तिक पर्व, छठ पूजा को पूरे ख़ुशी के साथ मनाते हैं। इस पर्व में बहुत सारी बातें होती हैं। और बहुत ही खुशी का माहौल होता है।

    आस्था का महापर्व छठ पूजा। पूरी तरह से महिलाओं को और पुरुषों को खुद करना होता है। जो पौराणिक कथाएं चली आ रही हैं। पुराणों के नियमों को ध्यान में रखते हुए। उसका पालन करते हुए, किसी तरह का कोई गलती ना हो। उन बातों को ध्यान में रखते हुए। छठ पूजा का पर्व लोग मनाते हैं। इससे छठ पूजा के पर्व में बस दो-तीन चीजें देखी जाती हैं।

    छठ पूजा का नहाए खाए कब है

    वह है छठ पूजा का नहाए खाए कब है। खरना कब है। जो कि नहाए खाए का पता चल जाने के बाद तो खरना का पता ऑटोमेटिक चली गया। आज नहाए खाए हैं तो कल खराना होगा। और परसो शाम का अरग होगा और चौथे दिन सुबह का अरग होगा। इस पर्व में सूर्य देवता का पर्व छठ पूजा में। बस पता किया जाता है, कि नहीं खाए कब है। हमें कैलेंडर और इंटरनेट से जानकारी मिलती है ,कि छठ पूजा कब है। उसके बाद लोग जुट जाते हैं इस पर्व की तैयारी में

    तपस्या करने से भी ज्यादा कठिन होता है यह पर्व। आपको पंडित जी यह बताएंगे। पंडित जी जो कि कैलेंडर के अनुसार आपको तारीख समय बताएंगे। इसके अलावा आपको प्रत्येक काम खुद से करना होता है। हर निगरानी खुद से रखनी होती है। जो कि इसमें पंडित जी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। छठ पूजा का सारा का सारा कार्य-भाड़ छठ परवैतिन खुद उठाती हैं। और खुद करती है।

    Festival Of Sun

    छठ पूजा का प्रत्येक दिन बहुत ही मनोरंजक और एक अलग सी फीलिंग जगाने वाली होती है। इन चारों दिन में आपको अलग से खुशी महसूस होगी। अंदर से यदि आपके यहां छठ पूजा हो रहा हो तो आप अंदर से वह खुशी महसूस करेंगे। जिसको कि मैं शब्दों के माध्यम से बायां नहीं कर सकता। छठ पूजा में कोई भी मूर्ति नहीं बनाई जाती। और मूर्तियों का पूजा करने का कोई परंपरा नहीं है। परंतु कहीं-कहीं लोग। लोगों को एकत्रित करने के लिए सूर्य देव की प्रतिमा बना देते हैं। पर छठ पूजा का यह पर्व किसी भी प्रतिमा से जुड़ा हुआ नहीं है। इसमें सिर्फ सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है।

    Chhath Upasana ki Parampara (उपासना की परंपरा)

    हमारे भारतवर्ष में सूर्य देव की उपासना की परंपरा ऋग्वेद से चली आ रही है। सूर्य देव और इसकी उपासना की चर्चा ब्रह्मा, वैवर्त पुराण, विष्णु पुराण, भगवत पुराण आदि में विस्तार पूर्वक की गयी है। मध्य काल में ही छठ सूर्योपासना को व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। जो अभी तक चला आ रहा है।

    छठ पूजा की सामाजिक संस्कृति और महत्व

    छठ पूजा का महत्वपूर्ण पक्ष छठ पूजा की सादगी और पवित्रता है। भक्ति और आध्यात्म से भरी हुई इस पर्व में बांस से निर्मित सूप, टोकरी जिसे हम डाला कहते हैं। को घाटों पे लेजाने की परंपरा है। वो भी फलों से और ठेकुआ आदि से सजा के इसमें फूलों को प्राथमिकता नहीं दी जाती। मिट्टी के बर्तन, गन्ना, गुड, गेहूं, चावल से बना हुआ प्रसाद।

    लोकजीवन को पूरे मिठास से भर देता है। और आप जानते ही हैं कि छठ पूजा का ठेकुआ कितना नामी है। शास्त्रों से अलग हटकर सामान्य व्यक्तियों द्वारा। खुद के बनाए हुए रीति-रिवाजों के रंगों में डूबा हुआ यह एक उपासना पद्धति है। जिसके केंद्र में वेदों पुराणों एवं धर्म ग्रंथ का ना होना किसानों और ग्रामीणों की जीवन का समावेश है।

    Chhath puja photo

    इस पर्व में ना ही विशेष रूप से धन की आवश्यकता होती है। ना ही पुरोहितों की और ना ही अभ्यास की कोई जरूरत होती है। इस पर्व में जरूरत पड़ती है, तो वह है पास पड़ोस के लोगों की, एकता की। यह पर्व हर पड़ोसियों को एक साथ जोड़ देता है। यदि किसी के बीच मनमुटाव हो तो उनको एक साथ खड़ा कर देता है।

    छठ पूजा में समाज के प्रत्येक व्यक्ति। जोकि समाज को हर तरह से एक साथ पूरा देखना चाहते हैं। और वे लोग, जो इस व्रत को मनाते हैं। और इस में आस्था रखते हैं। वह लोग एकत्रित होकर समाज के उन रास्तों को, उन गलियों को, जो छठ पूजा के घाट जाने की राहें होती हैं, रास्ते होते हैं। उनको साफ सुथरा करना, उनकी सफाई करना।

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    उन पर लाइट लगाना, तालाबों की सफाई, नदियों की सफाई, जहां यह पर्व मनाया जाता है। यह सब करने में समाज के लोग एक साथ होकर, एकजुट होकर, समाज को, अपने गांव के उन स्थानों को, साफ करवाते हैं। और लाइट लगाते हैं। इस पर्व में लोग सरकार द्वारा दी गई किसी भी राशि का इंतजार नहीं करते। लोग खुद से इन कार्यों को सफल करते हैं।

    यह पर्व समाज के व्यक्तियों को एक साथ जोड़ने का। और लोगों को एक साथ खुशियां बांटने का बहुत ही अच्छा मौका देता है। और लोग एक साथ होकर अपनी भागीदारी को समझते हुए समाज के प्रत्येक कार्य। जो छठ पूजा के रास्ते में एक बाधा बनता हो, उसको दूर करते हैं। और समाज के हर छठ घाट को सजाने में, सहयोग करते हैं। और यह भावना छठ पूजा को सामाजिक और सांस्कृतिक बातों से जोड़ती है।

    Chhath Puja Geet, Song, Gaana (छठ गीत)

    1. चार कोना के पोखरवा
    2. काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए'
    3. 'केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय
    4. सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार।
    5. उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर।
    6. निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे।
    7. चार कोना के पोखरवा
    8. हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।
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