Hindi. हुई मुद्दत की गालिब मर गया पर याद आता है। वह हर एक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता। दोस्तों 15 फरवरी को हमारे प्यारे शायर। मिर्जा असादुल्लाह खालिक की बरसी है होती है।
सलों पहले 18 से 69 ईसवी को 15 फरवरी दिन मिर्जा गालिब साहब इस जहां से रुखसत हो गए थे। जब भी कभी उर्दू शायरी पर बातचीत होती है। तो ग़ालिब साब का तसव्वुर अनजाने में ही ध्यान में आ जाता है। गालिब ने उर्दू शायरी को बड़ी जिन्नत पक्षी है।
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उर्दू साहित्य हमेशा इनका एहसानमंद रहेगा। गालिब के बाद उर्दू को एक नया आयाम मिला। इनके बिना उर्दू अदब अधूरा है। प्रोफेसर रशीद अहमद सिद्दीकी ने कहा है। कि मुगलों ने हिंदुस्तान को तीन चीजें दी थी। ताजमहल, उर्दू और ग़ालिब दोस्तों जो डेप्ट ग़ालिब की शायरी में है, ना वह शायद आपको कहीं भी देखने को ना मिले। जब ग़ालिब साहब को सुनते हैं। तो ऐसा नहीं लगता कि किसी 18वीं और 19वीं सदी के शायर को सुन रहे हो। बल्कि उनको सुनकर ऐसा लगता है।
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कि जैसे वही हमारे सामने बैठ कर हमसे बात कर रहे हो। इसकी वजह है। उनके अंदर की डेप्ट। उनकी शायरी की ज्ञान। और फलसफाना अंदाज। उनको सुनते हैं तो मानो वह हमें अपने करीब महसूस होते हैं। आज के दौर में भी वह उतने ही रिलेवेंट हैं। मशहूर स्कॉलर Ralph Russell ने लिखा है। अगर गालिब अंग्रेजी में लिखते तो। इतिहास के सबसे महान कवि होते। दोस्तों आज मैं लेकर आया हूँ। ग़ालिब साहब की 10 बेहतरीन शेर हिंदी ट्रांसलेशन के साथ मुझे उम्मीद है। कि यह आपको बहुत पसंद आएंगे। मेरी किस्मत में अगर इतना था। दिल भी यार अब कहीं दिए होते।ग़ालिब साहब की तमाम उम्र रंजो गम और मुफलिसी के आलम में गुजरी थी। इसी ने उनकी शायरी में दर्द और फलसफा भर दिया। उनकी शायरी में कितना दर्द है। आइए उनके आसार के आईने में देखते हैं। यूं ही गर रोता रहा गालिब पहले जरा देखना इन बस्तियों को तुम की वीरा हो गई। अगर ग़ालिब इसी तरह रोता रहा तो सारी दुनिया उसके आंसुओं में बह जाएगी। और लोगों एक दिन ऐसा होगा। कि तुम्हें यह बस्तियां विरान नजर आएंगी।
Urdu Shayar' 'Ghazal
- hazaron khvahishen aisi ki har khvahish par dam nikale, bahut nikale mere araman lekin phir bhi kam nikale
- yahi hai azamana to satana kisako kahate hain, adu ke ho lie jab tum to mera imtihan kyon ho
- hamako malum hai jannat ki haqiqat lekin, dil ke khush rakhane ko galib ye khayal achchha hai
- unako dekhe se jo a jati hai munh par raunak, vo samajhate hain ke bimar ka hal achchha hai
- Ishq par Zor Nahin hai ye Wo Aatish Ghalib,
- ki Lagaye Na Lage aur Bujhaye Na Bujhe
- tere waade par jiye ham, to yah jan, jhuth jana,
- ki khushi se mar na jaate, agar aitbaar hota
- tum na Aae to kya sahar na hui
- han magar chain se basar na hui
- mera nala suna zamane ne
- ek tum ho jise khabar na hui
- na tha kuchh to khuda tha, kuchh na hota to khuda hota,
- duboya mujhako hone ne na main hota to kya hota !
- hua jab gham se yun behish to gam kya sar ke katane ka,
- na hota gar juda tan se to jahanu par dhara hota!
- hui muddat ki galib mar gaya par yaad aata hai,
- vo har ik bat par kahana ki yun hota to kya hota !
- har ek baat pe kehte ho tum ki tu kya hai
- tumhin kaho ki ye andaz-e-guftagu kya hai
- Na shole Mein ye Karishma Na bark Mein ye ADA
- koi batao ki vo shokhe-tundakhu kya hai
- ye rashk hai ki vo Hota hai Hum Sukhan hamate
- varana khauf-e-Badamozi-e-Ada kya hai
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- chipak raha hai badan par lahoo se pairahan
- hamari zeb ko ab hajat-e-rafu kya hai
- jala hai jism jahan dil bhi jal gaya hoga
- kuredate ho jo ab rakh justaju kya hai
- ragon mein daudate phirane ke ham nahin qayal
- jab ankh hi se na tapaka to phir lahu kya hai
- vo chiz jisake liye hum ko ho bahisht aziz
- sivae bada-e-gulfam-e-mushkabu kya hai
- piyun sharab agar khum bhi dekh lun do char
- ye shisha-o-Qadah-o-Kuza-o-Subu kya hai
- Rahi na taqat-e-guftar aur agar ho bhi
- to kis ummid pe kahiye ke arazu kya hai
- Bana hai shah ka Musahib, Phire hai ItraAta
- vagarna shahar mein "ghalib" ki aabru kya hai
- ye ham jo hijr mein divar-o-dar ko dekhte hain
- kabhi saba ko, kabhi namabar ko dekhate hain
- vo ae ghar mein hamare, khuda ki qudrat hain!
- kabhi ham umako, kabhi apane ghar ko dekhate hain
- Nazar Lage Na Kahin Usake dast-o-Bazu ko
- ye log Kyun mere Zakhme Jigar ko Dekhte Hain
- tere zavahire tarfe kul ko kya dekhen
- ham auje tale lal-o-gohar ko dekhte hain
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इसलिए कोई ऐसा इंतजाम करो कि उसका दर्द कम हो जाए। और तुम्हारी बस्तियां बर्बादी से बची रहे। जिस बस्ती में रंजीता इंसान की फिक्र नहीं होती। वह बस्तियां तबाह हो जाती हैं। यार अब वह ना समझे हैं ना समझेंगे मेरी बात दे। और दिल उनको जो ना दे मुझको सुबह ए खुदा। मैंने हर तरीके से अपनी बात उनको कहना चाहि पर लगता है वह मेरे जज्बात कभी नहीं समझेंगे। ए खुदा अगर तुम मुझे ऐसी जवाब नहीं दे सकता। जिससे मैं अपनी बात उनको समझा पाऊं तो ऐसा कर तू उनका ही दिल बदल दे। और उन्हें ऐसा दिल दे-दे जो मेरे जज्बातों को समझ पाए।काशिद को अपने हाथ से गर्दन ना मारिए उसके खता नहीं है, यह मेरा कुसूर था। गालिब फरमाते हैं। आशिक को यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कि उसका महबूब किसी दूसरे की ओर जरा भी ख्याल करें। फिर चाहे उसे किसी का कत्ल ही क्यों ना करना हो। भले ही वह नफरत ही क्यों ना हो। महबूबा नफरत भी आशिक से ही करें। ऐसा ग़ालिब फरमाते हैं, कि अगर काशी अपने आप तक मेरा खत पहुंचाने की गुस्ताखी की है। तो आप गुस्से में आकर उसे ना मारिए क्योंकि वह बेचारा अपनी मर्जी से नहीं आया है।
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उसे तो मैंने भेजा है वह मेरा पैगाम लेकर आया है। इसलिए असली कुसूर बार मैं हूं। और इसकी सजा मुझे दी जाए फिर भी उसी बेवफा पर मरते हैं। फिर वही जिंदगी हमारी है। अपनी गली में आकर मुझको दफना कर मेरे पति से हल्क को क्यों तेरा घर मिले। आप से गुजारिश है कि मुझे कत्ल करने के बाद अपनी गली में ना दफनाना मुझे। यह बर्दाश्त नहीं कि लोग मेरी कब्र का पता पूछते-पूछते तेरे घर तक आ पहुंचे। ग़ालिब फरमाते हैं। कि मुझसे यह बात सहन नहीं होगी कि मेरे मरने के बाद भी तुझसे कोई मिले आ ही जाता। वह राह पर गालीब कोई दिन और भेजिए होते हैं।कहर हो या भला हो जो कुछ हो काश के तुम मेरे लिए होते। मेरी किस्मत में अगर इतना था। दिल भी यार अब कहीं दिए होते मैं बुलाता तो हूं उसको। मगर ए जज्बा ई दिल उस पर बन जाए कुछ ऐसी कि बिना ना बने मैं बुलाता तो हूं उसे। लेकिन वह ऐसे कहां ठहरे कि मैं बुलाऊँ और वह आ भी जाएं। काश कि उन पर कुछ ऐसी आन पड़े कि वह बिना ना रह पाए इश्क पर जोर नहीं है। यह वह आतिश ग़ालिब की लगाए न लगे और बुझाए न बने। इश्क पर किसी का जोर नहीं चलता। यह वह आग है।
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कि कोई लगाना चाहे तो लगती नहीं। और अगर एक बार लग जाए तो कोई लाख बुझाना चाहे तो बुझती नहीं। आखिर में उनके एक और शेर के साथ ग़ालिब साहब को खुदा हाफिज कहता हूं। जी तो नहीं चाहता कि ग़ालिब से रुखसत लूं। पर क्या करूं वह सब्रोसो मशाल कहां अब तो जिंदगी ने हमें उस मुकाम पर ला खड़ा किया है। कि जिसमें ना वह जुदाई का गम ही रहा। ना मिलने की खुशी दिन-रात महीने साल कब गुजरे पता ही नहीं चला। ना जाने कैसे दिन आ गए हैं वह पुराना जमाना जाने कहां खो गया। जमाना रोएगा बरसों हमें भी याद कर के गिनेंगे सब हमारी खूबियां जब हम ना रहेंगे। इन पंक्तियों से हम याद कर रहे हैं। आज के दो सदीपुर के उसशायर को जो इश्क़ मिजाज, युवा दीवानों, युवा दिलों की धड़कन से टकराकर। उनकी जुबान पर उनकी शेरो शायरियां सुनती है। बहादुर शाह जफर के दरबारी कवि और उर्दू भाषा के सर्वकालिक महान शायर मोहम्मद असद अल्लाह बैग जिन्हें दुनिया। संसार मिर्जा गालिब के नाम से याद करता है, जानता है। पहचानता है। दोस्तों आइए आज आपको टॉप टेन जो की मेरे हिसाब से मेरे संकलन में जो टॉप टेन शायरी है। जो मुझे बेहतरीन लगती है। वैसे तो हर एक शायरी मिर्जा गालिब की मुझे बहुत पसंद है। और यही कारण है कि मुझे उर्दू भाषा की ओर मिर्जा ग़ालिब खींच कर ले जाते हैं।
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मिर्जा गालिब। अगर इसे उर्दू साहित्य का सबसे बड़ा नाम कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। इनके बारे में कहा जाता है, कि यह लफ्ज़ नहीं एहसास लिखा करते थे। इनकी हर बात एक शेर हुआ करती थी। आज मैं ग़ालिब साहब के वह प्रसिद्ध आशा लेकर आया हूं। जिनमें दर्शन की झलक है। दोस्तों आज आप इस पोस्ट को आखिर तक जरूर देखना। आप जानोगे कि इनका लिखा एक-एक शेर किसी तालीम से कम नहीं। दोस्तों यह शायरी मैं अर्थ सहित लेकर आया हूं। क्योंकि ग़ालिब साहब अपनी शायरी में फारसी लफ्जों का बहुत अधिक इस्तेमाल किया करते थे। तो इसलिए उनको समझना थोड़ा मुश्किल होता है। तो चलिए आपका ज्यादा समय ना लेते हुए शुरू करता हूं।रंज से ख़ूगर हुआ इंसान तो मिट जाता है रंज। मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
गालिब कहते हैं। कि अगर एक इंसान को दुख दर्द सहने की आदत पड़ जाए। तो फिर कोई भी गम उसे दुखी नहीं कर सकता। क्योंकि वह दुख उठाने का आदी हो चुका होता है। इसी तरह मुझ पर इतनी मुश्किलें पड़ी है। कि मैं मुश्किलों का आदी हो गया हूं। और मेरी सब मुश्किलें अपने आप ही आसान हो गई हैं।
'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे
फरमाते हैं कि ए ग़ालिब यह जो उपदेश देते फिरते हैं। अगर यह तुझे बुरा कहे तो तू इनका बुरा मत मान। आखिर दुनिया में ऐसा कौन इंसान है। जिसे सब कोई अच्छा कहते हैं।
मिर्ज़ा ग़ालिब
न सुनो गर बुरा कहे कोई। न कहो गर बुरा करे कोई। ना लूटता दिन को तो कब रात को यूं बेखबर सोता। रहा खटकाना चोरी का दुआ देता हूं। वह जन को मुझे लुटेरे ने लूट लिया है। अब मैं बैठा हुआ उसको दुआएं दे रहा हूं। क्योंकि पहले अपनी माल की हिफाजत के ख्याल में मैं सो नहीं पा रहा था। अब माल ही नहीं रहा जिसकी हिफाजत कर सकूं, इसलिए सो रहा हूं।बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब' तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं।
फरमाते हैं कि ग़ालिब यह जो हमने फकीरों के जैसा भेष बनाया है। तो हम कोई भिखारी नहीं है। हमने तो यह भेस इसलिए बना रखा है। कि दौलतमंद लोग जो अपने आपको दादा समझते हैं। उनका तमाशा देख सके, कि वह कितने पानी में है।
सबके दिल में हर जगह तेरी जो तू राजी हो। तो मुझ पर कोई सामान मेहरबान हो जाएगा।
ग़ालिब साहब खुदा की ओर इशारा करते हुए कहते हैं। कि सबके दिल में तेरी जगह है अगर मुझ पर सिर्फ तेरी कृपा हो गई। तो सारा जमाना मुझ पर मेहरबान हो जाएगा।
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है कायनात को हरकत तेरे शौक से परतों को आफ़ताब के जर्रे में जान है।ग़ालिब फरमाते हैं कि दुनिया में जो जिंदगी नजर आती है। इसलिए क्योंकि सबको तेरा शौक है। और वह तुझे पाने के लिए जिंदा है। अपनी इस बात को साबित करने के लिए ग़ालिब दूसरी लाइन में कहते हैं। जैसे सूरज के नूर से एक ज़र्रा चमकता है। उसी तरह तेरे शौक से दुनिया भी कायम है। जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद फिर हंगामा ए खुदा क्या है।
ए खुदा जब तेरे बिना संसार में कोई मौजूद ही नहीं है। तो यह अभी की है बस की हर काम का आसां होना। आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसान होना। ग़ालिब साहब फरमाते हैं। कि हर काम का आसान होना बहुत मुश्किल है। इसका एक सबूत यह है कि। आदमी देखने में तो आदमी ही नजर आता है। पर सही अर्थों में एक सच्चा इंसान बनना बहुत मुश्किल है। हस्ती पे मत जाइए। असद आलम तमाम अलक़ायदा में ख्याल है।
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ग़ालिब साहब का एक नाम असद भी था इस शेर में वह फरमाते हैं। यह सारी दुनिया में ख्याल का जाल है। इसमें हकीक़त बिल्कुल नहीं है। इसलिए असद इस जिंदगी के धोखे में कभी मत आ जाना। गलीदे खस्ता के बगैर कौन से काम बंद है। रोज़ क्या कीजिए हाय हाय क्यों गाते हैं। इस दुनिया के काम कभी नहीं रुक सकते। कोई हो या ना हो कोई रहे या ना रहे। इससे दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मुफ्त में रोने पीटने से कोई फायदा नहीं। मेरी तामीर में मुसर है एक सूरत खराबी की बर्मन का है। खून गर्म है। ग़ालिब साहब कहते हैं। कि मेरी हर तामीर में खराबी है। जिस तरह की एक किसान दिनभर खेतों में कड़ी मेहनत करता है।अपनी पूरी जान लगा देता है खेत की पैदावार को बढ़ाने के लिए। लेकिन वही उसके लिए नुकसान बन जाती है। आसमान में जाकर बादल बनता है। और फिर बादल से बिजली बन कर उसकी खलियान को जला डालता है। इस तरह सारा खेल बिगड़ जाता है। जो यह कहे कि फारसी गुप्ता ए ग़ालिब शेर ग़ालिब की तारीख में है। उन्होंने खुद लिखा है। फरमाते हैं। कि अगर कोई यह कहे कि उर्दू की शायरी फारसी की शायरी की टक्कर की नहीं है तो। उसको गालिब के शेर पढ़कर सुना दो। कि देखो की टक्कर की है।
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तो ऐसा देखकर कोई कैसे मानेगा कि हम भी खुदा की बंदगी करने वाले इंसान थे। लोग तो मुझे धर्म के विरुद्ध चलने वाला इंसान ही बोलेंगे। कोई नहीं मानेगा कि हम भी खुदा के नेक बंदे थे। लेकिन मैं अपनी ही बात करूं। तो ऐसा दुख भरा जीवन जीकर किस मुंह से कहूं कि मेरा भी कोई खुदा है। कर्ज की पीते थे मैं लेकिन समझते थे। कि हां रंग लाएगी हमारी फाका मस्ती एक दिन।
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कर्ज लेकर शराब पिया जरूर करते थे। लेकिन इस चीज की भी हमें समझ थी कि बुरे हालात में भी मस्त रहने। की हमारी आदत एक दिन जरूर हमें इस मुकाम तक जरूर लेकर जाएगी। जहां हमारी कद्र होगी और मेरे साथ में विश्वास की वजह यह थी। कि बुरे हालातों में भी मैंने अपनी बुद्धि को हमेशा ऊंचा रखा। मैं से गरज निषाद है। किस रूसिया को 1 गुना बेखुदी मुझे दिन-रात चाहिए। शराब पीने से किस पापी इंसान को सुख मिलता होगा। मुझे तो दिन रात थोड़ा सा बेसुध रहना है। बस इसीलिए पी लेता हूं। यह मसाई ले तो यह तेरा बयान काली तुझे हम वली समझते। जो नाबाद अखबार होता। गालिब तेरा यह सूफियाना अंदाज यह तेरे विचार तुझे तो हम वली समझते। अगर तू शराबी ना होता होगा। कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को ना जाने शायर तो अच्छा है। पर बदनाम बहुत है चंद तस्वीरें बुता चंद हसीनों के खुद बाद मरने के मेरे। घर से सामान निकला कुछ सुंदर स्त्रियों की तस्वीरें। कुछ हसीनों के खत। मेरे मरने के बाद लोगों को मेरे घर से बस यही चीजें मिली।Mirza ghalib shayari quote
बाजी जायसवाल है। दुनिया मेरे आगे होता है। सब रोज तमाशा मेरे आगे यह सारी दुनिया। मेरे सामने बच्चों के खेल जैसी है। मैं बुद्धि की ऐसी अवस्था पर हूं। जहां से मुझे संसार के कामकाज बच्चों के खेल तमाशे लगते हैं। और हर रोज यह तमाशा मेरे आगे होता है। जाते हुए कहते हो कयामत को मिलेंगे क्या हो गया मत काहे। गया कोई दिन और जाते हुए हम से कह रहे हैं। कि अब तो कयामत को ही मिलेंगे। आज जब तुम हमको छोड़कर जा रहे हो। तो हमारे लिए आप से बड़ा कयामत का दिन और क्या होगा। क्या हमारे लिए आज से बड़ी कयामत भी कभी हो सकती है। हुई मुद्दत के वालिद मर गया।पर याद आता है। वह हर एक बात पर कहना यूं होता। तो क्या होता। गालिब को मरे एक दौर गुजर गया। लेकिन गालिब के बात करने का अंदाज आज भी याद आता है। उनका बात बात पर यह कहना कि अगर ऐसा होता तो क्या होता। उनका यह बात बात पर सवाल करने का तरीका। आज भी याद आता है। दोस्तों उम्मीद करता हूं कि यह पोस्ट आपको पसंद आई होगी।








